Rajasthan assembly elections 2023: राजस्थान में इस साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि अभी बीजेपी उनको खास महत्व नहीं दे रही है। दो बार सूबे की सीएम रह चुकीं वसुंधरा राजे को लेकर कहा जाता है कि वे आसानी से हार मानने वालों में से नहीं हैं। कहा जा रहा है कि न तो उनको अब संगठन में तवज्जो मिल रही है, न ही पीएम मोदी की रैली में मंच पर। लेकिन वसुंधरा को ही राजस्थान बीजेपी में सबसे लोकप्रिय नेता माना जाता है। पार्टी के लिए उनको साइडलाइन करना इतना आसान नहीं है। वसुंधरा को दरकिनार करने से पहले वो पहलू जानने की जरूरत है, जो उनकी ताकत माने जाते हैं। वसुंधरा की वोटरों में अच्छी पकड़ मानी जाती है।
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वसुंधरा की ताकत के 5 कारण
- राजस्थान में जीत और हार का अंतर कम रहता है। कांग्रेस भी लगातार पहले अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच पिस रही थी। लेकिन अब ये खबरें नहीं सुनने को मिल रही हैं। बीजेपी ने कोई सीएम फेस नहीं किया है। कांग्रेस अपनी नीतियों के सहारे पार पाने की कोशिश कर रही है। लेकिन पिछले चुनाव पर नजर डालें, तो 30 ऐसी सीटें थी, जो सिर्फ 5 फीसदी के कम अंतर से बीजेपी हार गई थी। वहीं, 2003 और 08 में लगभग 42 फीसदी सीटें ऐसी थीं, जिन पर हार जीत का अंतर मामूली रहा था। अगर बीजेपी वसुंधरा को साइडलाइन करती है, तो यहां पार्टी को उनकी कमी खल सकती है। वोट छिटक सकता है।
- पिछली बार कांग्रेस जीती जरूर, लेकिन जीत का अंतर बीजेपी की तुलना में 0.5 फीसदी वोट ज्यादा मिलना था। इस बार बीजेपी का फोकस महिला प्रवासी वोटों पर है। यानी इनकी आबादी 5 फीसदी है। बीजेपी की सोच है कि जो नुकसान हुआ था, उसकी भरपाई इससे हो जाएगी। इन महिलाओं में वसुंधरा की अच्छी पकड़ मानी जाती है। अगर वसुंधरा राजे को तवज्जो नहीं मिलती, तो कहीं न कहीं नुकसान बीजेपी को हो सकता है।
- बीजेपी को महिलाओं का वोट खूब मिलता है। इसका कारण मानी जाती हैं वसुंधरा राजे, जिन्होंने महिलाओं के लिए सीएम रहते काम किए थे। उनका रक्षा सूत्र कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हुआ था। फिलहाल बीजेपी की कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में जो हार हुई है, उसका कारण महिला वोटरों का छिटकना माना जा रहा है। राजस्थान में महिलाओं के वोट पुरुषों के मुकाबले बीजेपी के खाते में जाते रहे हैं। 2013 और 18 के आंकड़े कुछ ऐसा ही दिखाते हैं। कांग्रेस पर बीजेपी महिला विरोधी होने के आरोप लगाती रही हैं। अगर वसुंधरा की अनदेखी होती है, तो माइलेज कांग्रेस को मिल सकती है।
- वसुंधरा खुद को राजपूतों की बेटी, जाटों की बहू और गुर्जरों की समधन कह तीनों जातियों को साधती रही हैं। उनके बेटे ने गुर्जर जाति में विवाह किया है। जिनकी समधन होने की बात कहती हैं। गुर्जरों के वोट अधिकतर बीजेपी और प्रतिस्पर्धा में मीणा के वोट कांग्रेस को जाते रहे हैं। वसुंधरा गुर्जरों से रोटी-बेटी का रिश्ता बता पार्टी के लिए वोट जुटाती रही हैं। अगर वसुंधरा नाराज होती हैं, तो ये वोट कांग्रेस को जा सकते हैं। वहीं, कांग्रेस में गुर्जर नेता सचिन पायलट भी लगातार कांग्रेस के लिए जोर लगा रहे हैं। ऐसे में उनको फायदा मिल सकता है। वहीं, मीणा की अगर बात करें, तो ये लगभग 50 सीटों पर निर्णायक हैं। वसुंधरा खुद जाट जाति में विवाहित हैं। जाट जागीरदारी प्रथा खत्म करने और भू अधिकार मिलने के बाद से कांग्रेस के वोटर माने जाते हैं। जाट लगभग 15 फीसदी विधायक तय करते हैं। 60 सीटों पर निर्णायक की भूमिका में हैं। लेकिन वाजपेयी सरकार में इनको ओबीसी में शामिल किया गया था। 1998 में कांग्रेस ने भी जाट नेता को सीएम नहीं चुना। माना जा रहा है कि इसके बाद से ये लोग वसुंधरा के पीछे वोट देने लगे हैं। वसुंधरा की नाराजगी का कांग्रेस को फायदा मिल सकता है।
- वसुंधरा राजे का संगठन पर तगड़ा प्रभाव है। हर सीट पर उनके वोटर हैं। वे बीजेपी की लाइन से हटकर भी प्रदेश का दौरा समय-समय पर करती रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि वसुंधरा लगभग 20 से 25 सीटों पर सीधे तौर पर पार्टी को फायदा या नुकसान पहुंचा सकती हैं। उनके इशारे पर पार्टी के खिलाफ समर्थक चुनाव लड़ सकते हैं। जिससे बीजेपी का वोट बंट सकता है और फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। ऐसे में वसुंधरा को पार्टी पूरी तरह से अलग-थलग करना भाजपा के लिए घातक साबित हो सकता है।
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