यह पर्यावरण दिवस कई मायने में ख़ास है देश भर में ढेर सारे आयोजन हो रहे हैं . इस मौके पर देश के मशहूर पर्यावरण कर्मी पीपल बाबा के पर्यावरण संवर्धन के लिए किये गए कार्यों पर आधारित बहु प्रतिक्षित पुस्तक "पीपल की छॉव में " का लोकार्पण कल पेड़ लगाकर किया .

यह एक ऐसी पुस्तक है जो पर्यावरण, आध्यात्म और मानवीय संवेदनाओं को एक सूत्र में पिरोती है. यह केवल वृक्षों की कहानी नहीं, बल्कि उस गहरे संबंध की खोज है जो मनुष्य और प्रकृति के बीच सदियों से मौजूद है. इस पुस्तक में पीपल बाबा ने अपने जीवन के अनुभवों, संस्मरणों और विचारों के माध्यम से यह दिखाया है कि पीपल का वृक्ष केवल एक प्राकृतिक इकाई नहीं, बल्कि ऊर्जा, चेतना और आध्यात्मिकता का प्रतीक है. भारतीय संस्कृति में इसकी विशेष महत्ता को लेखक ने आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया है. यह पाठकों को न केवल पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करती है, बल्कि उन्हें अपने भीतर और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को महसूस करने के लिए प्रेरित करती है.

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हर आंदोलन का बीज विश्वास होता है. इसकी शुरुआत एक फुसफुसाहट से होती है, कुछ अच्छा करने की इच्छा से और यह एक जंगल में इसलिए तब्दील हो जाता है, क्योंकि दूसरे भी उसी भावना को महसूस करते हैं. पीपल बाबा कहते हैँ कि मेरे मन में इस किताब का विचार 2012 में आया था. इसे पूरा करने के लिए समय और शांति पाने में एक दशक से अधिक का समय लगा और नवंबर 2024 में एक सड़क दुर्घटना हो गई, इसी दरम्यान, पेंगुइन प्रकाशन के उच्चा धिकारियों से हुईं चर्चा से इस किताब को लिखने का संयोग बना .

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अतीत के भूतों को शांत होने में लंबा समय लगा. लगभग पाँच दशकों तक ज़मीनी स्तर पर काम करने, 2.70 लाख हेक्टेयर में वनस्पति को पुनर्स्थापित करने, ढाई करोड़ पेड़ और उतनी ही झाड़ियाँ लगाने के बाद, मैं स्वीकार करता हूँ. मैंने नाममात्र का ही बदलाव किया है, लेकिन मैंने कोशिश तो की है. यही मायने रखता है. ‘पीपल की छाँव में’ केवल कहानियाँ नहीं हैं. वे हमारी भारतीय मानसिकता के प्रतीक हैं, जो हमारी संस्कृति, शास्त्रों, मिथकों और स्मृतियों में रचे-बसे हैं. कुछ मान्यताएँ तो संस्था का रूप ले चुकी हैं, पवित्र और अछूत. वे हमारे सामूहिक डीएनए का हिस्सा हैं. पीपल के पेड़ ने मुझे बचपन से ही आकर्षित कर रखा था. मैंने इस महत्त्वपूर्ण प्रजाति के पौधारोपण, संरक्षण और प्रचार-प्रसार में अड़तालीस वर्ष व्यतीत किए हैं. यह पुस्तक उस लंबे साथ को साझा करने का मेरा तरीका है, जो खट्टे -मीठे और पवित्र दोनों है.

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दुनिया को उसके वास्तविक स्वरूप में देखें :

पीपल बाबा बताते हैं कि नानी की बदौलत मेरा उत्तराखंड के जंगलों, कॉर्बेट, राजाजी, हरिद्वार, ऋषिकेश, नरेंद्र नगर, टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल और अल्मोड़ा से परिचय हुआ.
रहस्यमय, चमत्कारी, जीवंत. यह समर्पण के बारे में है. मैं बस यह दिखाना चाहता हूँ कि हरियाली और जैव विविधता से प्रेम करना कितना आसान है, छोटे-छोटे, सुंदर कदम उठाना कितना मायने रखता है. मैंने हमेशा अपने लिए लिखा है. मुझे अपनी डायरी पढ़ना और पुरानी यादों को ताज़ा करना अच्छा लगता था. 

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हमारे छोटे परिवार का तबादला हिमाचल प्रदेश के डलहौजी में हो गया. दशकों बाद भी, महामारी के दौरान लगे लॉकडाउन में भी, मैं दीवारों के अंदर नहीं रह सकता था. मैं पौधों को पानी देता, अपनी पीठ पर धूप महसूस करता, हवा से ऐसे बात करता जैसे वह मेरी कोई पुरानी दोस्त हो. प्रकृति ने हमें कैद में रहने के लिए नहीं बनाया. उसने खुला आसमान बनाया और उसे घर कहा.

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कैंब्रियन हॉल स्कूल मेरी पहली औपचारिक कक्षा बनी. उससे पहले, मैंने कोलकाता, डलहौजी और चंडीगढ़ में एक-एक साल पढ़ाई की थी, जो एक छोटे लड़के के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण पाठ्यक्रम था. 

मेरी नानी मेरे जन्म के समय मेरी माँ की मदद करने आई थीं, लेकिन सच तो यह है कि वे हमारे घर की बागडोर संभालने आई थीं. डलहौजी, कोलकाता और देहरादून होते हुए, अंत में अपने सबसे छोटे बेटे के साथ रहने के लिए इलाहाबाद चली गईं. मेरे जन्म से लेकर स्नातक होने तक (1966-1986), मैं हमेशा उनकी उपस्थिति में रहा. मिट्टी का वह टुकड़ा पर्यावरण के बारे में मेरी पहली शिक्षा थी. वहाँ मैंने सीखा कि धरती सुनती है, पानी के भी अपने मिजाज़ होते हैं और बीज एक ऐसा वादा है जो कभी नहीं भूलता.
 

पर्यावरणीय परिवर्तन केवल संस्थानों या नीतियों से शुरू नहीं होता, बल्कि यह साधारण नागरिकों से शुरू होता है जो कार्य करने का निर्णय लेते हैं. हर वह समाज जिसने अपने प्राकृतिक संसाधनों की सफलतापूर्वक रक्षा की है, उसने इसलिए किया है क्योंकि व्यक्तियों ने भूमि, जल और पौधों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा और निभाया. स्वयंसेवक किसी भी पर्यावरणीय आंदोलन की जीवंत नींव होते हैं.


 अगर आप उस छाया के मूल्य का आकलन करने लगें, तो आप हैरान रह जाएंगे. एक छायादार पेड़ की छांव से एक विक्रेता को प्रतिदिन के किराये की बात करें तो , लगभग 200 रुपये प्रतिदिन, देने से मुक्ति मिल जाती है. इस तरह सालाना 70,000 रुपये की बचत होती है. पीपल के पत्ते की अपनी एक अलग ही खुशबू होती है, हल्की राल जैसी, मिट्टी जैसी, जिसमें हरी चाय और बारिश की हल्की-सी महक भी होती है. आयुर्वेद में पीपल के पत्तों का पाउडर अस्थमा के लिए और इसका काढ़ा हृदय रोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. पवित्र शब्द ने मेरे लिए कई द्वार खोल दिए और मैं अपने नर्सरी के गमलों के साथ एक तीर्थयात्री की तरह प्रवेश कर गया. मराठवाड़ा में लोग नीम को बहुत पसंद करते थे, इसलिए मैंने उनकी गलियों को नीम से भर दिया. राजस्थान और गुजरात में, वे अरावली की कठोर प्रजातियाँ चाहते थे— लसोड़ा, चामरोड़, बहेड़ा, निर्गुंडी, वज्रदंती, मेहंदी, करौंदा. औषधीय, सूखा-सहनशील, गर्वित छोटी प्रजातियाँ जो उस भीषण गर्मी में भी टिकी रह सकती हैं जहाँ उम्मीद भी मुरझा जाती है.