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भोजशाला में मंदिर होने के पक्के सबूत! ASI रिपोर्ट में किया गया बड़ा दावा

भोजशाला में एएसआई सर्वे के दौरान 11वीं सदी के मंदिर के अवशेष और 97 हिंदू मूर्तियां मिली हैं. हाईकोर्ट में पेश रिपोर्ट के अनुसार मस्जिद का निर्माण मंदिर के स्तंभों पर किया गया था.

इंदौर के चर्चित भोजशाला मामले में हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अपनी विस्तृत सर्वे रिपोर्ट अदालत को सौंप दी है, जिसे कोर्ट ने रिकॉर्ड पर ले लिया है. सुनवाई के दौरान यह भी पता चला कि सर्वे रिपोर्ट पहले ही लीक हो चुकी थी और सभी पक्षकारों के पास इसकी कॉपी पहुंच गई है. हाईकोर्ट ने अब सभी पक्षों को इस रिपोर्ट पर अपने दावे, आपत्तियां और सुझाव पेश करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है. इस मामले की अगली सुनवाई अब 16 मार्च को होगी, जिसमें वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर बहस आगे बढ़ेगी.

मंदिर के अस्तित्व के मिले ठोस सबूत

एएसआई की रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं ने इस विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है. रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वर्तमान ढांचा 11वीं-12वीं शताब्दी के एक पुराने मंदिर के अवशेषों पर खड़ा किया गया है. सर्वे के दौरान परिसर से हिंदू धर्म से संबंधित कुल 97 कलाकृतियां और मूर्तियां मिली हैं. इनमें भगवान गणेश, ब्रह्मा, शिव, हनुमान और श्री कृष्ण की खंडित मूर्तियां शामिल हैं. इसके अलावा दीवारों और खंभों पर संस्कृत और प्राकृत भाषा के ढेरों शिलालेख मिले हैं, जिनमें राजा भोज के समय की काव्य रचनाएं और व्याकरण के सूत्र मौजूद हैं. रिपोर्ट में उस स्थान की भी पहचान की गई है जहाँ कभी मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित थी.

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मस्जिद निर्माण में मंदिर के पत्थरों का उपयोग

सर्वे रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया है कि वर्तमान मस्जिद के निर्माण में मंदिर के ही स्तंभों और पत्थरों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया था. कई खंभों पर उकेरी गई घंटियां, कमल के फूल और कीर्तिमुख जैसे हिंदू वास्तुकला के प्रतीक साफ तौर पर नजर आते हैं. एएसआई ने पाया कि कई जगहों पर पुरानी नक्काशी और हिंदू प्रतीकों को मिटाने या प्लास्टर से ढंकने की कोशिश की गई थी, लेकिन वैज्ञानिक जांच के दौरान प्लास्टर के नीचे पुरानी कलाकृतियां फिर से दिखाई दी हैं. ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) तकनीक के जरिए जमीन के नीचे दबी हुई दीवारों और कमरों का भी पता चला है जो मूल मंदिर की नींव का हिस्सा हैं.

राजा भोज के काल का शिक्षण केंद्र

वैज्ञानिक विश्लेषण और कार्बन डेटिंग के आधार पर एएसआई इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि यह स्थल राजा भोज (1000-1055 ईस्वी) के शासनकाल में एक महान शिक्षण केंद्र और भव्य मंदिर था. खंभों और पत्थरों पर मराठा काल के प्रभाव भी देखे गए हैं जो इसके निरंतर उपयोग की पुष्टि करते हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि परमार कालीन वास्तुकला की शैली हर जगह मौजूद है. अब इस वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्ष अपनी दलीलें कोर्ट के सामने रखेंगे. यह रिपोर्ट इस ऐतिहासिक विवाद के कानूनी समाधान के लिए सबसे मजबूत और अहम आधार बनकर उभरी है.


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