मध्य प्रदेश के इंदौर संभाग में स्थित धार जिले की ऐतिहासिक भोजशाला पर विवाद फिर गरमाया है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की ताजा रिपोर्ट ने दावा किया है कि यहां प्राचीन मंदिर और शैक्षणिक मठ को मुगल-पूर्व काल में तोड़ दिया गया, मूर्तियां नष्ट की गईं और उस स्थान पर मस्जिद और मजार बना दिए गए. इस दावे को मजबूती अब्दुल्ला शाह चंगाल के मकबरे के प्रवेश द्वार पर लगा शिलालेख देता है, जो महमूद खिलजी (1436-1469) के शासनकाल का है.

1000 साल पुरानी भोजशाला को लेकर बड़ा खुलासा


करीब 1000 साल पुरानी भोजशाला का इतिहास राजा भोज से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने 1010 से 1055 ई. के बीच मालवा में सरस्वती सदन की स्थापना करवाई. वर्तमान में सरस्वती सदन को भोजशाला कहा जाता है. 1034 ई. में यहां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की गई थी. ASI रिपोर्ट के खंड-चार, पृष्ठ 260 पर दर्ज शिलालेख की 17वीं-18वीं पंक्तियां साफ बताती हैं कि प्राचीन धार्मिक मंदिर और मठ में देवमूर्तियां थीं, जिन्हें सेना के साथ आए शासक ने ध्वस्त कर मस्जिद में तब्दील कर दिया. फारसी शिलालेख (हिजरी 859/1455 ई.) का हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद रिपोर्ट में शामिल है.

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हाई कोर्ट में पेश की गई 2189 पन्नों की रिपोर्ट


मध्य प्रदेश हाई कोर्ट इंदौर में विचाराधीन इस मामले में 2024 के 98 दिवसीय सर्वे के बाद 2189 पन्नों की रिपोर्ट पेश हुई. दोनों पक्षों से आपत्तियां मांगी गई हैं, अब इस मामले में अगली सुनवाई 16 मार्च को होगी. सर्वे में मिले अवशेष मंदिर शैली के खंभे, क्षतिग्रस्त देवाकृतियां, फिर से इस्तेमाल किए गए पत्थरों की मूल संरचना, हिंदू स्वरूप की ओर इशारा करते हैं. खिड़की फ्रेम पर बची मूर्तियां भी यही कहानी कहती हैं.

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सेवानिवृत्त ASI अधिकारी डीके रिछारिया कहते हैं, 'भोजशाला का मूल रूप मंदिर का था, जिसे बदलने के लिए इमारत को नुकसान पहुंचाया गया.' याचिकाकर्ता आशीष गोयल का मानना है कि शिलालेख सरस्वती मंदिर सिद्ध करने वाला साक्ष्य है. वहीं, कमाल मौलाना वेलफेयर कमेटी के सदर अब्दुल समद ने 1903-04 के पुराने सर्वे का हवाला देकर आपत्ति जताते हुए कहा, 'यह हमेशा से मस्जिद ही रही है.'