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उम्र 55 और काम करने में नहीं हैं सक्षम... तो जाइए घर, गुजरात सरकार का बड़ा फैसला; विभागों में मचा हड़कंप

राज्य सरकार का मानना है कि सरकारी कामकाज में किसी भी प्रकार की लापरवाही या ढिलाई अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी. सरकार प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक सक्रिय और जवाबदेह बनाना चाहती है.

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गुजरात सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को लेकर बड़ा फैसला लिया है. राज्य सरकार अब 55 वर्ष की आयु पूरी कर चुके कर्मचारियों के कामकाज और प्रदर्शन की समीक्षा करेगी. यदि किसी कर्मचारी के काम में लापरवाही, ढिलाई या असंतोषजनक प्रदर्शन पाया गया तो सरकार ऐसे कर्मचारियों को समय से पहले अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे सकती है. सरकार के इस फैसले के बाद विभिन्न विभागों के कर्मचारियों में हड़कंप मच गया है.

राज्य सरकार ने मांगी कर्मचारियों की जानकारी


जानकारी के अनुसार राज्य सरकार ने सभी विभागों से ऐसे कर्मचारियों की जानकारी मांगी है जिन्होंने पिछले छह महीनों में 55 वर्ष की आयु पूरी की है या जल्द पूरी करने वाले हैं. सरकार ने ग्रुप-1 से लेकर ग्रुप-4 तक के कर्मचारियों का पूरा रिकॉर्ड तलब किया है. विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि 30 मई तक कर्मचारियों की जानकारी हिसाब और कोषागार निदेशक कार्यालय को भेजी जाए.

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11 बिंदुओं के आधार पर होगी जांच


सरकार कर्मचारियों की कार्यक्षमता की जांच करीब 11 अलग-अलग बिंदुओं पर करेगी. इसमें कर्मचारियों की कार्यशैली, अनुशासन, कार्य के प्रति रवैया, कार्यक्षमता, शिकायतें और विभागीय रिकॉर्ड जैसी बातों को शामिल किया जाएगा. जिन कर्मचारियों के प्रदर्शन को संतोषजनक नहीं माना जाएगा, उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है.

लापरवाही-ढिलाई अब बर्दाश्त नहीं


राज्य सरकार का मानना है कि सरकारी कामकाज में किसी भी प्रकार की लापरवाही या ढिलाई अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी. सरकार प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक सक्रिय और जवाबदेह बनाना चाहती है. इसी कारण विभिन्न विभागों में कर्मचारियों के प्रदर्शन की समीक्षा की प्रक्रिया शुरू की गई है.

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पहले भी सरकार ने लिया ऐसा फैसला


हालांकि यह पहली बार नहीं है जब गुजरात सरकार ने ऐसा कदम उठाया हो. इससे पहले भी सरकार ने नियमों में बदलाव कर यह व्यवस्था लागू की थी कि यदि कोई कर्मचारी काम में अक्षम पाया जाता है तो उसे 58 वर्ष की सामान्य सेवानिवृत्ति आयु से पहले 50 या 55 वर्ष की उम्र में भी रिटायर किया जा सकता है.

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सरकार के इस फैसले को प्रशासनिक सख्ती के रूप में देखा जा रहा है. वहीं कर्मचारी संगठनों में इस फैसले को लेकर चिंता का माहौल है. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर कर्मचारी संगठनों की प्रतिक्रिया भी सामने आ सकती है.

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