दिल्ली के जागने से बहुत पहले ही गैर-पंजीकृत क्षेत्र के हजारों काम करने वाले अपना दिन शुरू कर देते हैं. वे घर-घर जाकर कचरा इकट्ठा करते हैं फिर एक जगह बैठकर हर दिन कई किलो कचरे को हाथों से अलग करते हैं और देश की पुनर्चक्रण आधारित अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को आगे बढ़ाते हैं. लंबे समय तक इन लोगों को पहचान नहीं मिली, लेकिन अब यह परिस्थिति धीरे-धीरे बदल रही है.
इनमें से हजारों कामगारों के लिए यह पहचान वर्ष 2020 से धीरे-धीरे बदलनी शुरू हुई है. इसकी शुरुआत बैंक खाता खुलने, बचत की आदत होने और बीमा की सुविधा मिलने से हुई है. यह बदलाव केवल आर्थिक सुरक्षा का नहीं, बल्कि सम्मान से भी जुड़ा है.
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दिल्ली में कचरा बीनने वाले जोगिंदर केवट (48 वर्षीय) ने कहा, "पहले मेरी पूरी कमाई रोजमर्रा की जरूरतों में खर्च हो जाती थी. लेकिन अब मैं बचत करता हूं और घर के खर्च, खाने तथा बच्चों की पढ़ाई की बेहतर व्यवस्था कर सकता हूं." केवट जैसे हजारों लोग ‘उत्थान परियोजना’ का हिस्सा हैं. यह संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और कुछ सहयोगी संस्थाओं की मदद से शुरू हुई एक पहल है, जिसका मकसद भारत के कचरा इकट्ठा करने वाले कामगारों को पर्यावरण के रक्षक, प्रहरी (रक्षक), चक्रण आधारित अर्थव्यवस्था के सहयोगी और जलवायु कार्रवाई के भागीदार के रूप में पहचान दिलाना है.
विश्व पर्यावरण दिवस 2026 पर शुरू किए गए ‘प्लैनेट स्टार्ट्स विद पीपल’ अभियान के तहत इन कामगारों को जलवायु परिवर्तन की कहानी के केंद्र में लाने का प्रयास किया जा रहा है. ये वही लोग हैं जो पहले से ही पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास में अपना योगदान दे रहे हैं, लेकिन उनकी भूमिका को नजरअंदाज कर दिया जाता है.
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केवट ने कहा, "योजना से जुड़ने से पहले मेरे हालात सही नहीं थे और मैं हर दिन करीब 100 से 150 रुपये कमाता था. अब मेरा रोजगार सुरक्षित हुआ है और कमाई भी बढ़ी है. इससे मेरे और मेरे परिवार के लिए ज़िंदगी जीना आसान हुआ है. मुझे सरकार की कई योजनाओं और सहायता के बारे में भी जानकारी मिली."
देश में 42 हजार से अधिक कचरा कामगार इस योजना से जुड़े हैं. इन सभी को यह पहचान अलग-अलग तरीकों से मिली है, और उनके काम को अब सम्मान मिलने लगा है.
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यूएनडीपी की भारत में प्रतिनिधि एंजेला लुसिगी ने बताया कि यह अभियान दर्शाता है कि जलवायु कार्रवाई की शुरुआत स्थानीय स्तर पर लोगों से होती है और कचरा कामगार इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं, क्योंकि वह रोज़ कचरा साफ करते हैं, लेकिन उन्हें अक्सर जलवायु संरक्षण के येाद्धाओं के रूप में नहीं देखा जाता.
यूएनडीपी इंडिया में जलवायु और पर्यावरण विभाग के प्रमुख आशीष चतुर्वेदी ने बताया "कचरा कामगारों तक सरकारी कल्याणकारी योजना इसलिए नहीं पहुंच पाती थी क्योंकि उन्हें जानकारी और आत्मविश्वास की कमी थी.
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