बिहार विधान परिषद की खाली 10 सीटों में छह साल के कार्यकाल वाली 9 सीटों के चुनाव और 4 साल के बचे टर्म वाली 1 सीट के लिए उप-चुनाव 18 जून को होने वाले हैं. बता दें कि यह उपचुनाव पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार के विधान परिषद छोड़ने से खाली हुई सीट के लिए हो रहा है. इस सीट का कार्यकाल अभी करीब चार साल बचा हुआ है. विधान परिषद की ये सभी सीटें विधानसभा कोटे की हैं. यानी इन सीटों पर सीधे जनता नहीं, बल्कि बिहार विधानसभा के विधायक मतदान करते हैं. 1 जून से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

बता दें कि पूर्व सीएम और राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार की सीट के लिए उप-चुनाव होगा, क्योंकि उनका टर्म 4 साल बाकी था. इस सीट पर जेडीयू का ही कोई नेता लड़ेगा, लेकिन वो नीतीश के बेटे और स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार नहीं भी हो सकते हैं, क्योंकि टर्म कम है. 2030 में अगर निशांत किसी सीट से विधानसभा चुनाव लड़कर आना चाहते हों, तो फिलहाल उनको 4 साल वाला एमएलसी बनाया जा सकता है. बची 9 सीटों पर 6 साल के पूरे कार्यकाल का चुनाव हो रहा है.

---विज्ञापन---

किन सीटों पर हो रहा है चुनाव

नियमित चुनाव वाली 9 सीटों में जदयू के श्रीभगवान सिंह कुशवाहा, गुलाम गौस, भीष्म सहनी और कुमुद वर्मा की सीट शामिल हैं. भाजपा के सम्राट चौधरी और संजय मयूख का कार्यकाल भी समाप्त हो रहा है. राजद के सुनील कुमार सिंह और मोहम्मद फारूक तथा कांग्रेस के समीर कुमार सिंह की सीटों पर भी चुनाव होना है.

---विज्ञापन---

बिहार में एमएलसी चुनाव का जो भी खेल होना है, वो 9 सीटों के चुनाव में होना है. इसलिए 9 सीटों के चुनाव की प्रक्रिया समझने से हार-जीत का अंदाजा लगाया जा सकता है. मतदान तभी होगा जब कैंडिडेट की संख्या 9 से ज्यादा हो, नहीं तो सारे निर्विरोध जीत जाएंगे. 10 या उससे ज्यादा कैंडिडेट लड़े तो मतदान होगा.

---विज्ञापन---

एनडीए और महागठबंधन की स्थिति

वर्तमान समय में विधानसभा में एनडीए के पास जदयू, भाजपा, लोजपा (रामविलास), हम और रालोमो को मिलाकर 202 विधायक हैं. इस संख्या के आधार पर एनडीए आसानी से 8 सीटें जीत सकता है. दूसरी तरफ महागठबंधन के पास राजद, कांग्रेस, माले, सीपीएम और अन्य सहयोगी दलों को मिलाकर 35 से ज्यादा विधायक हैं. इसके अलावा एआईएमआईएम और बसपा के विधायक भी विपक्षी खेमे में हैं. कुल मिलाकर विपक्ष के पास लगभग 41 विधायक हैं, जो एक सीट जीतने के लिए पर्याप्त हैं.

---विज्ञापन---

दूसरी वरीयता के वोट क्यों अहम

यदि पहली वरीयता के वोटों से सभी सीटों का फैसला नहीं हो पाता, तो दूसरी वरीयता के मतों की गिनती शुरू होती है. इसी प्रक्रिया से पहले भी राज्यसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार शिवेश राम को जीत मिली थी. उस चुनाव में कई उम्मीदवार पहले दौर में ही जीत गए थे. उनके अतिरिक्त वोटों की वैल्यू निकालकर दूसरी वरीयता के आधार पर दूसरे उम्मीदवार को ट्रांसफर किया गया. इसी वजह से शिवेश राम जीत का आंकड़ा पार कर सके थे.

---विज्ञापन---

क्या बदल सकता है समीकरण?

फिलहाल विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों को देखें तो एनडीए के पास 8 सीटें जीतने का स्पष्ट गणित है. वहीं महागठबंधन एक सीट जीत सकता है. एनडीए के पास 8 सीट जीतने के बाद केवल दो अतिरिक्त वोट बचेंगे, जबकि विपक्ष के पास करीब 16 वोट बचेंगे. इन अतिरिक्त वोटों के आधार पर कोई भी पक्ष अतिरिक्त सीट नहीं निकाल सकता. यदि किसी दल ने रणनीतिक तौर पर 10वां उम्मीदवार उतार दिया या कहीं क्रॉस वोटिंग हुई, तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है.