Bihar By Election: बिहार की राजनीति में पहली बार चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर ने पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का दांव चल दिया है. लेकिन यह दांव जितना बड़ा है, उतना ही मुश्किल भी. वजह साफ है, बांकीपुर लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रहा है और यहां भाजपा को हराना किसी भी दल के लिए आसान नहीं रहा है.

अगर महागठबंधन अपना उम्मीदवार नहीं उतारता और प्रशांत किशोर का समर्थन करता, तो मुकाबला काफी दिलचस्प हो सकता था. विपक्षी वोटों के एकजुट होने से भाजपा को कड़ी चुनौती मिल सकती थी. लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में इसकी संभावना बेहद कम दिखती है. इसके पीछे दो बड़े कारण माने जा रहे हैं.

पहला, राष्ट्रीय जनता दल और खासकर तेजस्वी यादव अपने समानांतर किसी नए विपक्षी चेहरे को मजबूत होते नहीं देखना चाहेंगे. कन्हैया कुमार जैसे नेताओं का उदाहरण अक्सर इस संदर्भ में दिया जाता है, जहां विपक्ष के भीतर नए चेहरों को सीमित राजनीतिक स्पेस मिला.

दूसरा, प्रशांत किशोर को लेकर विपक्ष के एक वर्ग में यह धारणा बनी हुई है कि वे भाजपा की 'बी-टीम' हैं. चाहे इस आरोप के पक्ष में ठोस राजनीतिक प्रमाण हों या नहीं, लेकिन चुनावी राजनीति में ऐसी धारणाएं भी गठबंधन की संभावनाओं को प्रभावित करती हैं.

सिर्फ गठबंधन ही नहीं, जातीय और राजनीतिक समीकरण भी भाजपा के पक्ष में दिखाई देते हैं. बांकीपुर विधानसभा सीट पर भाजपा का परंपरागत वोट बैंक मजबूत माना जाता है. वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के नितिन नवीन को 63 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे. दूसरे स्थान पर राजद की रेखा कुमारी को लगभग 30 प्रतिशत वोट मिले, जबकि जन सुराज के उम्मीदवार को करीब 5 प्रतिशत वोटों से संतोष करना पड़ा.

अब सवाल यह है कि क्या प्रशांत किशोर के खुद मैदान में उतरने से यह तस्वीर बदल सकती है?

इसमें कोई संदेह नहीं कि उम्मीदवार के तौर पर प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत पहचान, राजनीतिक अभियान और मीडिया में उनकी मौजूदगी जन सुराज के वोट शेयर में बढ़ोतरी कर सकती है. लेकिन चुनावी गणित बताता है कि करीब 5 प्रतिशत वोट शेयर से सीधे 45–50 प्रतिशत के जीत के आंकड़े तक पहुंचना बेहद कठिन चुनौती होगी. इसके लिए उन्हें न सिर्फ अपने नए वोट जोड़ने होंगे, बल्कि भाजपा और महागठबंधन—दोनों के पारंपरिक वोट बैंक में भी बड़ी सेंध लगानी होगी.

ऐसे में बांकीपुर का उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि प्रशांत किशोर की राजनीतिक स्वीकार्यता की सबसे बड़ी परीक्षा भी होगा. अगर वे भाजपा को कड़ी टक्कर देते हैं, तो भले नतीजा उनके पक्ष में न आए, लेकिन बिहार की राजनीति में जन सुराज की ताकत बढ़ सकती है. वहीं अगर अंतर बहुत बड़ा रहता है, तो विरोधियों को यह कहने का मौका मिलेगा कि चुनावी रणनीति और चुनाव जीतने की राजनीति में बड़ा फर्क होता है.