Science News in Hindi: नीदरलैंड की यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा डिजिटल टूल तैयार किया है जो आपको करोड़ों साल पीछे ले जा सकता है. 'Paleolatitude.org' नाम की इस वेबसाइट के जरिए अब यह पता लगाया जा सकता है कि आज आप जिस जगह पर रह रहे हैं, वह लाखों साल पहले दुनिया के नक्शे में कहां मौजूद थी. यह मॉडल पिछले 32 करोड़ सालों के इतिहास को समेटे हुए है, जो पंजिया के सुपरकॉन्टिनेंट वाले दौर तक जाता है. इस टूल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें उन छोटे टेक्टोनिक प्लेट्स और गायब हो चुके जमीनी हिस्सों को भी शामिल किया गया है जो अब धरती की सतह पर नहीं दिखते.

फॉसिल्स और जलवायु के अनसुलझे रहस्यों का समाधान

वैज्ञानिकों के लिए अक्सर यह समझना मुश्किल होता था कि किसी देश में मिलने वाले जीवाश्म (फॉसिल्स) वहां के मौजूदा माहौल से मेल क्यों नहीं खाते. उदाहरण के तौर पर नीदरलैंड में मिले 24 करोड़ साल पुराने पौधे और जानवर आज के फारस की खाड़ी जैसे गर्म रेगिस्तानी इलाकों में रहने वाले जीवों जैसे हैं. इस नए टूल की मदद से यह साफ हो गया है कि उस वक्त नीदरलैंड की स्थिति भूमध्य रेखा के काफी करीब थी. किसी भी पत्थर या जीवाश्म की सही पहचान के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि वह असल में किस अक्षांश (Latitude) पर बना था.

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गायब हो चुके महाद्वीपों की खोज और मैपिंग

इस मॉडल को तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों ने टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल और पहाड़ों के अंदर दबे मुड़े हुए पत्थरों का गहराई से अध्ययन किया है. इसमें 'पेलियोमैग्नेटिज्म' तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जो पत्थरों के अंदर कैद चुंबकीय संकेतों से उनके पुराने स्थान का सटीक अंदाजा लगाती है. शोधकर्ताओं ने ग्रेटर एड्रिया और आर्गोलैंड जैसे उन 'खोए हुए महाद्वीपों' का भी पता लगाया है जो अब टूटकर हिमालय या इंडोनेशिया जैसे हिस्सों में समा चुके हैं. पहली बार एक ऐसा ग्लोबल मॉडल मिला है जो गायब हो चुकी प्लेटों और पत्थरों के सफर को जोड़ने में सक्षम है.

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भविष्य की रिसर्च और जीवन की उत्पत्ति की राह

यह तकनीक केवल भूगोल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लुप्त हो चुकी प्रजातियों और महाविनाश (Mass Extinction) के कारणों को समझने में भी मदद करेगी. इससे यह पता चल सकेगा कि अतीत में जब धरती बहुत ज्यादा गर्म या ठंडी हुई, तो किन इलाकों में जीवन सुरक्षित रहा और कहां से प्रजातियां पूरी तरह खत्म हो गईं. फिलहाल यह मॉडल 32 करोड़ साल पुराना डेटा दिखाता है, लेकिन वैज्ञानिक इसे 55 करोड़ साल पीछे कैम्ब्रियन विस्फोट के दौर तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं. इससे हम यह जान पाएंगे कि जब धरती पर जटिल जीवन की शुरुआत हुई, तब दुनिया का नक्शा कैसा दिखता था.

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