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7000 साल पहले कैसे होती थी खेती? वैज्ञानिकों ने खोजा प्राचीन दुनिया का चौंकाने वाला सच

Ancient Discovery: मोरक्को में मिले 7,000 साल पुराने डीएनए ने मानव विकास की कहानी बदल दी है. इस खोज से खुलासा हुआ है कि खेती का विस्तार प्रवासियों और स्थानीय शिकारियों के मेलजोल का नतीजा था.

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प्राचीन मानव को लेकर चौंकाने वाली खोज

Ancient DNA Discovery: मानव इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति यानी खेती की शुरुआत को लेकर मोरक्को में एक ऐसी खोज हुई है जिसने वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया है. मोरक्को के तीन प्रमुख पुरातात्विक स्थलों काफ तात एल-घर, इफ़्री एन-अम्र ओ मौसा और सिखरत-रुआजी से मिले 7,000 साल पुराने इंसानी अवशेषों के डीएनए ने प्राचीन मानव मूल की पूरी कहानी ही बदल दी है. अब तक माना जाता था कि खेती या तो किसी एक जगह से फैली या फिर स्थानीय तौर पर विकसित हुई. लेकिन ‘नेचर’ पत्रिका में छपी इस नई रिसर्च ने साफ कर दिया है कि उत्तरी अफ्रीका के इस क्षेत्र में इंसानी सभ्यताओं का विकास अलग-अलग समूहों के बीच हजारों सालों तक चले मेलजोल और संघर्ष का नतीजा था.

डीएनए ने खोली पूर्वजों की छिपी हुई परतें

वैज्ञानिकों को काफ तात एल-घर साइट से ऐसे इंसानों के पूर्वजों के सुराग मिले हैं जो करीब 7,400 साल पहले यूरोप से चलकर उत्तरी अफ्रीका पहुंचे थे. यह खोज साबित करती है कि जिब्राल्टर जलडमरूमध्य को पार करके इंसानों का आना-जाना हमारी सोच से कहीं ज्यादा पहले शुरू हो गया था. वहीं इफ़्री एन-अम्र ओ मौसा साइट पर चौंकाने वाली बात यह दिखी कि वहां रहने वाले मूल शिकारियों ने बिना अपनी पहचान खोए खेती और मिट्टी के बर्तन बनाने की कला को अपना लिया था. यानी बाहर से आए लोगों ने स्थानीय लोगों को खत्म नहीं किया, बल्कि दोनों संस्कृतियों के मिलने से एक नई ‘हाइब्रिड’ समाज की शुरुआत हुई.

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प्रवासी चरवाहों और नई तकनीक का आगमन

सिखरत-रुआजी साइट से मिले सबूत बताते हैं कि करीब एक हजार साल बाद इस इलाके की तस्वीर फिर बदल गई थी. यहां के डीएनए में ‘फर्टाइल क्रीसेंट’ यानी पश्चिम एशिया से आए चरवाहा समूहों के अंश मिले हैं. ये प्रवासी अपने साथ न केवल नए जानवर और खेती के तरीके लाए, बल्कि मिट्टी के बर्तनों की एक बिल्कुल नई शैली भी लेकर आए जिस पर रस्सी जैसे निशान बने होते थे. यूनिवर्सिटी ऑफ कोर्डोबा के राफेल एम. मार्टिनेज का कहना है कि यह खोज उत्तरी अफ्रीका के इतिहास के लिए एक बड़ा मोड़ है. यह साफ करता है कि उस दौर का मोरक्को दुनिया का एक ऐसा चौराहा था जहां यूरोप, सहारा और मध्य पूर्व की संस्कृतियां आपस में टकरा रही थीं.

आधुनिक आबादी और तीन पूर्वजों का संगम

इस रिसर्च का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि आज के उत्तरी अफ्रीकी लोग, जिनमें इमाजीघेन या बर्बर शामिल हैं, तीन मुख्य स्रोतों का मिश्रण हैं. इनमें वहां के मूल शिकारी, यूरोप से आए किसान और पश्चिम से आए चरवाहा समूह शामिल हैं. यह खोज उस पुरानी धारणा को पूरी तरह खारिज करती है जिसमें माना जाता था कि किसी एक समूह ने दूसरे की जगह ले ली. इसके बजाय यह सदियों तक चले आपसी संपर्क और बदलाव की एक जटिल कहानी पेश करती है. कुल मिलाकर यह अध्ययन हमें बताता है कि खेती की क्रांति कोई एक झटके में हुई घटना नहीं थी, बल्कि यह अलग-अलग रास्तों और संस्कृतियों के मेल से बना एक रंगीन मोजेक था.

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7 हजार साल पहले कैसे होती थी खेती?

सामान्य जानकारी के अनुसार, 7000 साल पहले खेती की शुरुआत एक बड़े बदलाव के तौर पर हुई थी. उस समय लोग पत्थर और लकड़ी के बने साधारण औजारों का इस्तेमाल करते थे. मुख्य रूप से गेहूं, जौ और मटर जैसी फसलें उगाई जाती थीं. साथ ही, इंसानों ने जंगली जानवरों को पालतू बनाकर पशुपालन और खेती का संगम शुरू किया था.

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लेखक के बारे में

Raja Alam

राजा आलम वर्तमान में News 24 हिंदी (B.A.G. Network) में सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. हिंदी पत्रकारिता में चार वर्षों के अनुभव के साथ नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर बारीकी से लेखन कर रहे हैं. पत्रकारिता की नींव देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU), अलीगढ़ से रखी, जहां से राजा आलम ने पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद, हिंदी लेखन में गहराई को और विस्तार दिया जब राजा ने जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से हिंदी साहित्य में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की. हर रोज़ कुछ नया सीखना और पाठकों तक सही, निष्पक्ष और भरोसेमंद खबर पहुंचाना उनका मुख्य उद्देश्य रहा है. राजा के लेखन में आपको पत्रकारिता की गंभीरता के साथ-साथ पाठकों से जुड़ने वाली सरल भाषा और कंटेंट की विविधता दोनों मिलेंगे.
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