जब एक टैंक का पानी सूख जाता है तो उसकी तली में कुछ ऐसा दिखाई देता है जिसे किसी भक्त ने पहले कभी नहीं देखा होता. महाराष्ट्र के नासिक में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में ठीक ऐसा ही हुआ, जहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) मंदिर परिसर के अंदर मौजूद लगभग 65 फुट गहरे पत्थर के टैंक ‘अमृत कुंड’ का पानी निकालकर उसकी सफाई कर रहा था. जब कर्मचारियों ने दशकों से जमा गाद को हटाया तो टैंक की तली में पत्थर से तराशा हुआ एक शिवलिंग दिखाई दिया. ये इतने लंबे समय से पानी में डूबा हुआ था कि इसके होने की बात लोगों की यादों में ही बची थी.
ये भी पढ़ें: Jagannath Rath Yatra 2026: हर साल 15 दिनों के लिए बीमार पड़ते हैं भगवान जगन्नाथ, जानें कारण और अनसर काल का महत्व
त्र्यंबकेश्वर के अमृत कुंड में ASI को क्या मिला?
अमृत कुंड, जिसे कभी-कभी अमृतवर्षिणी भी कहा जाता है, पेशवा के ज़माने का एक तालाब है जिसका पानी लंबे समय से रोज़ाना पूजा और अभिषेक के लिए इस्तेमाल होता रहा है. ये मंदिर के बाहर बने बड़े कुशावर्त कुंड से अलग है, जो गोदावरी नदी का सोर्स है. ASI ने 1 जुलाई को ये खोज शेयर की और बताया कि तालाब के फ़र्श से जमा गाद और मलबा हटाने के बाद ये पानी निकला. इसकी कोई पक्की उम्र नहीं है, क्योंकि इस पर अभी तक कोई पेट्रोग्राफिक या डेटिंग स्टडी पब्लिश नहीं हुई है और इस खोज पर कोई पीयर-रिव्यूड रिसर्च पेपर भी नहीं है. बस इतना कहा जा सकता है कि इससे एक बाहरी सीमा मिलती है.
तालाब कहां है?
ये तालाब एक मंदिर के अंदर है जिसे 1755 और 1786 के बीच पेशवा बालाजी बाजी राव ने फिर से बनवाया था. मतलब ये कम से कम 240 साल पुराना है और शायद काफी पुराना है. अगर ये उस पहले के मंदिर का है जिसे औरंगज़ेब की सेना ने 1690 में तोड़ दिया था, जिससे ये लगभग 335 साल या उससे ज़्यादा पुराना हो जाएगा. कुछ स्थानीय परंपराएं तो इसे और भी आगे ले जाकर बहुत पुराने मूल मंदिर का ही हिस्सा मानती हैं, लेकिन इसकी पुष्टि के लिए लिथोलॉजी जैसे असली डेटिंग कामों की जरूरत होगी.
छिपी हुई नक्काशी क्यों दिखाई देती है?
ये असल में sedimentation की प्रक्रिया है. हर बारिश के मौसम में, ऐसे जलाशय में मिट्टी, रेत और जैविक पदार्थों की एक नई परत जमा हो जाती है, जो सदियों से परतों के रूप में इकट्ठा होती रहती है. संरक्षण विशेषज्ञ इस प्रक्रिया को ‘डीसिल्टिंग’ कहते हैं और ये असल में एक नियंत्रित खुदाई है. जैसे-जैसे गाद की हर परत हटती है, उसमें दबी हुई चीज़ें जैसे सीढ़ियां, दीवारें और मूर्तियां बिना किसी खुदाई के ही दिखाई देने लगती हैं. त्रिमबकेश्वर दक्कन ट्रैप पर्वतमाला पर मौजूद है, जो लगभग 66 मिलियन साल पहले विशाल ज्वालामुखी विस्फोटों द्वारा निर्मित बेसाल्ट की परतें हैं. यहां के शिल्पकारों ने मंदिरों, किलों और गुफा-गृहस्थियों के लिए इसी काले बेसाल्ट को 2,000 सालों से तराशा है, क्योंकि ये मौसम के प्रभावों का असाधारण रूप से प्रतिरोध करता है.
ये भी पढ़ें: क्या भूतों ने एक रात में बनाया था ककनमठ मंदिर? जानें 1000 साल पुराने शिव मंदिर का रहस्य
संबंधित खबरें
मंगल के चांद से मिट्टी क्यों लाना चाहता है जापान, क्या है MMX मिशन?
2 days agoदुनिया के सबसे प्रदूषित 20 शहरों में से 13 भारत में, दिल्ली का नाम नहीं
4 days agoजिंदगी के लिए पृथ्वी के अलावा साइंटिस्ट्स को क्यों है बेहतर ग्रह की उम्मीद?
9 days ago11 अक्टूबर को धरती से टकरा सकता जबरदस्त सौर तूफान, भारत पर क्या होगा असर?
13 days agoसुपर-डुपर अल नीनो मजबूत, धरती के बड़े हिस्से में बढ़ेगी गर्मी
15 days agoफ्रांसिस हैल्जेन ने जीता फिजिक्स का नोबेल प्राइज 2026
17 days ago'ऑप्टोजेनेटिक्स' पर काम करने वाले 3 साइंटिस्ट्स को मेडिसिन में नोबेल प्राइज
18 days agoखतरे में है कैलिफोर्निया! प्रशांत महासागर में पनप रहा है El Nino
21 days agoSpaceX का रॉकेट Starship लॉन्च, वहां जाने का इरादा जहां कोई इंसान न गया हो
24 days agoअंतरिक्ष में मिल गया जीवन? करोड़ों किमी दूर एक ग्रह से आ रहे रेडियो सिग्नल
26 days agoन्यूज 24 पर पढ़ें देश, राष्ट्रीय समाचार (National News), खेल, मनोरंजन, धर्म, लाइफ़स्टाइल, हेल्थ, शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।
First published on:
Know More: Editorial Guidelines