जन्माष्टमी पर क्यों काटा जाता है नाल वाला खीरा, क्या है इसके पीछे का कारण?

Janmashtami 2025: जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर कई परंपराएं निभाई जाती हैं, जिनमें से एक खास रिवाज नाल वाला खीरा काटने का भी है। यह परंपरा विशेष रूप से उत्तर भारत, खासकर मथुरा, वृंदावन और अन्य क्षेत्रों में प्रचलित है। क्या आप जानते हैं कि श्रीकृष्ण के जन्मदिन पर नाल वाला खीरा क्यों काटा जाता है, इसका क्या महत्व है?

Janmashtami 2025

credit- pexels+freepik

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Janmashtami 2025: साल 2025 में 16 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का अभिषेक करके जन्म कराया जाता है। इसके साथ ही इस दिन नाल वाला खीरा काटने की भी प्रथा है। माना जाता है कि इस दिन नाल वाला खीरा अवश्य काटना चाहिए। ऐसा न करने से पूजा पूर्ण नहीं होती है और जन्माष्टमी का अनुष्ठान अधूरा माना जाता है।

क्यों काटा जाता है नाल वाला खीरा?

नाल वाला खीरा वह खीरा होता है, जिसका डंठल (नाल) अभी हरा और ताजा होता है, यानी वह पौधे से हाल ही में तोड़ा गया हो। जन्माष्टमी की रात, ठीक मध्यरात्रि 12 बजे जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म किया जाता है तब इस खीरे को पूजा के बाद काटा जाता है। यदि खीरे से पानी निकलता है, तो इसे शुभ और भगवान का आशीर्वाद माना जाता है।

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दरअसल यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करती है। इसको काटने के पीछे कई प्रमुख कारण हैं।

1- नाल वाला खीरा गर्भनाल (umbilical cord) का प्रतीक है, जो मां और शिशु को जोड़ती है। खीरे को काटना श्रीकृष्ण के जन्म और गर्भनाल काटने की प्रक्रिया को दर्शाता है। यह प्रतीकात्मक रूप से उनके जन्म की पवित्रता और जीवन की शुरुआत को दर्शाता है।

2- खीरे से पानी निकलना जीवन, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि पानी का निकलना यह दर्शाता है कि श्रीकृष्ण का आशीर्वाद भक्तों को प्राप्त होगा।

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लड्डू गोपाल का होता है अभिषेक

भगावन श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के दिन रात 12 बजे प्रतीकात्मक रूप से लड्डू गोपाल की मूर्ति का जन्म किया जाता है। इसमें उनका दूध, दही, पंचामृत, गंगाजल और शहद, घी आदि से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद नाल वाला खीरा काटा जाता है, इस प्रक्रिया का कुछ जगहों पर नाल छेदन कहा जाता है। इसके बाद उनको वस्त्र पहनाए जाते हैं और इत्र की सेवा की जाती है।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्रों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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