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Surya Grahan 2026: राहु या केतु, किस ग्रह से है सूर्य ग्रहण का संबंध, जानिए क्या है पौराणिक कहानी

Surya Grahan 2026: 17 फरवरी 2026 को साल का पहला वलयाकार सूर्य ग्रहण लगेगा. इस तरह के ग्रहण को ‘रिंग ऑफ फायर’ कहा जाता है. ज्योतिष गणनाओं के अनुसार यह ग्रहण कुंभ राशि और धनिष्ठा नक्षत्र में होगा. क्या आप जानते हैं, इस सूर्य ग्रहण का संबंध राहु से है या केतु से? आइए विस्तार से जानते हैं, इससे जुड़ी पौराणिक कहानी…

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Surya Grahan 2026: 17 फरवरी 2026 को साल का पहला वलयाकार सूर्य ग्रहण लगेगा. इस तरह के ग्रहण को ‘रिंग ऑफ फायर’ कहा जाता है. इस दिन चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह ढक नहीं पाएगा. सूर्य का बाहरी किनारा अग्नि के चमकते छल्ले जैसा नजर आएगा. ज्योतिष गणनाओं के अनुसार यह ग्रहण कुंभ राशि और धनिष्ठा नक्षत्र में होगा. ऐसे में सवाल उठता है, सूर्य ग्रहण का संबंध राहु से है या केतु से? आइए विस्तार से जानते हैं, इससे जुड़ी पौराणिक कहानी…

राहु से जुड़ी है पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार सूर्य ग्रहण का मुख्य संबंध राहु से माना जाता है. कथा समुद्र मंथन के समय की है, जब ‘स्वरभानु’ नामक असुर ने देवताओं के बीच बैठकर अमृत पी लिया था. तभी सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान कर ली और भगवान विष्णु को बता दिया. उसे क्षण भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उस असुर का सिर काट दिया.

अमृत पी लेने के कारण असुर समाप्त नहीं हुआ, बल्कि सिर वाला भाग राहु कहलाया और धड़ वाला हिस्सा केतु बना. मान्यता है कि राहु समय-समय पर सूर्य को निगलने की कोशिश करता है. इसी कारण सूर्य ग्रहण लगता है. लेकिन राहु का केवल सिर है. इसलिए सूर्य कुछ समय बाद बाहर निकल आता है और ग्रहण समाप्त हो जाता है.

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केतु की क्या भूमिका है?

केतु को अधिकतर चंद्र ग्रहण से जोड़ा जाता है. फिर भी ज्योतिष में सूर्य और केतु की युति को भी ग्रहण समान प्रभाव वाला माना जाता है. कुंडली में सूर्य-केतु साथ हों तो इसे पितृ दोष या कर्म संबंधी योग कहा जाता है. इसे अहं को कम करने वाला और आध्यात्मिकता बढ़ाने वाला भी माना गया है.

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ज्योतिष में ग्रहण योग

ज्योतिष शास्त्र कहता है कि जब सूर्य और राहु एक ही भाव में आते हैं तो सूर्य-राहु ग्रहण दोष बनता है. इसे जीवन में बाधा, तनाव और अस्थिरता का संकेत माना जाता है. कुछ मतों के अनुसार सूर्य और केतु की करीबी युति भी ग्रहण जैसा प्रभाव देती है.

क्या कहता है विज्ञान?

खगोल विज्ञान के अनुसार राहु और केतु कोई वास्तविक ग्रह नहीं हैं. ये चंद्रमा की कक्षा के दो बिंदु हैं. इन्हें उत्तर और दक्षिण नोड कहा जाता है. जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में आते हैं, तब ग्रहण होता है. सूर्य ग्रहण में चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है. लेकिन, पौराणिक कथा में राहु मुख्य पात्र हैं. ज्योतिष में राहु और केतु दोनों की भूमिका मानी गई है.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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लेखक के बारे में

Shyamnandan

श्यामनंदन कुमार News24.com में चीफ सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले श्यामनंदन ज्योतिष, अंक शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, पर्व-त्योहार सहित भारतीय धर्म-संस्कृति के जानकार पत्रकार हैं. उन्होंने पत्रकारिता में एम.ए. की पढ़ाई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से की है और ज्योतिष का अध्ययन भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से किया है. अपने पेशे में डिजिटल करियर की शुरुआत उन्होंने एनडीटीवी कन्वर्जेंन्स के साथ की. श्यामनंदन हिंदुस्तान टाइम्स, बंसल न्यूज (भोपाल) जैसे न्यूज प्लेटफॉर्म्स के साथ भी जुड़े रहे हैं. उन्होंने देश के प्रसिद्ध संतों के सत्संग और समागम की रिपोर्टिंग की है.
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