Sheetala Saptami 2026: होली के ठीक सात दिन बाद, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को 'शीतला सप्तमी' का पावन पर्व मनाया जाता है. हिंदू धर्म में यह त्योहार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि बदलती ऋतु के साथ बेहतर स्वास्थ्य और स्वच्छता का एक बड़ा संदेश है. माता शीतला, जिन्हें देवी पार्वती और दुर्गा का अवतार माना जाता है, उनकी पूजा विशेष रूप से संक्रामक रोगों और गर्मी से होने वाली बीमारियों से बचने के लिए की जाती है. आइए विस्तार से जानते हैं, इस दिन की महिमा और इसके पीछे के वैज्ञानिक कारण.
कब है शीतला सप्तमी 2026?
द्रिक पंचांग के अनुसार, इस साल शीतला सप्तमी का पर्व मंगलवार 10 मार्च, 2026 को मनाया जाएगा. सप्तमी के अगले दिन यानी 11 मार्च को शीतला अष्टमी या बसोड़ा अष्टमी मनाई जाएगी. इस दिन सुबह 08:21 बजे तक हर्षण योग रहेगा और साथ ही रवि योग का भी संयोग है, जो पूजा के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है.
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क्यों मनाई जाती है शीतला सप्तमी?
शीतला सप्तमी को मनाने के पीछे पौराणिक कथाएं और मौसमी स्वास्थ्य नियम दोनों ही शामिल हैं:
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महामारियों से सुरक्षा: स्कंद पुराण के अनुसार, जब असुर 'ज्वरासुर' (बुखार का असुर) ने दुनिया में असाध्य बीमारियां फैलाईं, तब देवी शीतला ने प्रकट होकर संसार को इन कष्टों से मुक्त किया था. चेचक, खसरा और चिकनपॉक्स जैसी बीमारियों से बचने के लिए माता की आराधना अचूक मानी जाती है.
प्रकृति की उपचारात्मक शक्ति: देवी शीतला के हाथों में झाड़ू और कलश होता है. झाड़ू स्वच्छता का प्रतीक है जो कीटाणुओं को साफ करने का संदेश देती है, जबकि जल का कलश पवित्रता और शीतलता प्रदान करने का प्रतीक है.
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बदलते मौसम का संकेत: यह पर्व गर्मियों की शुरुआत में आता है. यह हमें याद दिलाता है कि मौसम के गर्म होने पर स्वच्छता बनाए रखना और ठंडी चीजों का सेवन करना शरीर के लिए कितना जरूरी है.
'बसोड़ा' की अनूठी परंपरा
इस महापर्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसकी भोजन परंपरा है, जिसे 'बासोड़ा' कहा जाता है. यह शीतला सप्तमी के अगले दिन मनाया जाता है, जिसे शीलता अष्टमी कहते हैं.
बसोड़ा (बासी भोजन) की परंपरा: इस दिन घरों में ताज़ा भोजन नहीं बनाया जाता और न ही चूल्हा जलाया जाता है. भक्त एक दिन पहले यानी सप्तकि तिथि को बना हुआ भोजन ही ग्रहण करते हैं. माना जाता है कि गर्मी के आगमन पर बासी और ठंडा भोजन पाचन तंत्र को शांत रखता है और शरीर के तापमान को संतुलित करता है.
रोग प्रतिरोधक क्षमता: माता की पूजा मुख्य रूप से बच्चों की सुरक्षा के लिए की जाती है. पुराने समय में बच्चे संक्रामक बीमारियों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते थे, इसलिए मांएं अपनी संतान की लंबी आयु और स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रखती हैं.
स्वच्छता और नीम का उपयोग: इस त्योहार में सफाई पर विशेष जोर दिया जाता है. नीम की पत्तियों का उपयोग किया जाता है, जिनमें औषधीय और एंटीसेप्टिक गुण होते हैं. यह परंपरा हमें घर और परिवेश को कीटाणुमुक्त रखने की प्रेरणा देती है.
आध्यात्मिक शुद्धता: भक्त इस दिन व्रत रखकर तन और मन की शुद्धि करते हैं. ऐसी मान्यता है कि शीतल मन और स्वस्थ शरीर ही सुखी जीवन का आधार है.
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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.