Shabari Jayanti 2026 Today: आज रविवार 8 फरवरी 2026 को शबरी जयंती मनाई जा रही है. यह पर्व रामायण की महान भक्त माता शबरी की स्मृति में मनाया जाता है. शबरी जयंती हर वर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को आती है. यह दिन केवल एक तिथि नहीं है. यह सच्ची भक्ति, गुरु-आज्ञा और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है. माता शबरी की कथा यह सिखाती है कि भगवान को पाने के लिए बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि पवित्र मन और अटूट विश्वास चाहिए. आइए जानते हैं, शबरी जयंती का महत्व क्या है और श्रमणा कैसे बनी 'शबरी'?

शबरी जयंती का महत्व

शबरी जयंती यह संदेश देती है कि भक्ति में जाति, वर्ग, लिंग या सामाजिक स्थिति कोई बाधा नहीं होती. माता शबरी एक वनवासी महिला थीं. फिर भी भगवान श्री राम ने उन्हें अत्यंत प्रेम और सम्मान दिया. इस दिन भक्त भगवान राम और माता शबरी की पूजा करते हैं. रामायण के शबरी प्रसंग का पाठ किया जाता है. भजन और कीर्तन होते हैं. दान और सेवा का भी विशेष महत्व माना जाता है. विशेष रूप से बेर का भोग लगाया जाता है. यह उन मीठे बेरों की स्मृति है, जिन्हें माता शबरी ने प्रेमपूर्वक भगवान राम को अर्पित किया था.

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माता शबरी कौन थीं

रामायण और पुराणों के अनुसार माता शबरी का जन्म भील समुदाय की शबर जाति में हुआ था. उनका बचपन का नाम श्रमणा था. उनके पिता का नाम अज और माता का नाम इन्दुमती बताया गया है. श्रमणा बचपन से ही शांत स्वभाव की थीं. उनका मन सांसारिक विषयों में नहीं लगता था. उन्हें वैराग्य और साधना की ओर झुकाव था. यह देखकर माता-पिता चिंतित रहने लगे. उन्होंने श्रमणा का विवाह करने का निश्चय किया.

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श्रमणा ने क्यों छोड़ा घर?

विवाह की तैयारियों के समय श्रमणा ने देखा कि घर में अनेक पशु-पक्षी बांधे गए हैं. उन्होंने अपनी माता से इसका कारण पूछा. माता इन्दुमती ने बताया कि विवाह भोज के लिए इन पशु-पक्षियों का उपयोग किया जाएगा. यह सुनकर श्रमणा का मन व्यथित हो गया. उन्होंने हिंसा और बंधन को स्वीकार नहीं किया. उसी क्षण उन्होंने विवाह न करने का निश्चय कर लिया. रात्रि के समय जब सभी सो गए, तब श्रमणा ने बाड़े के किवाड़ खोल दिए और सभी पशु-पक्षियों को मुक्त कर दिया. यह बात लोगों को पता चल गई. भय और अपमान से बचने के लिए श्रमणा वहां से निकल पड़ीं.

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ऋष्यमूक पर्वत पर तपस्विनी जीवन

घर छोड़ने के बाद श्रमणा ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचीं. वहां अनेक ऋषि निवास करते थे. श्रमणा ने गुप्त रूप से वहीं रहना शुरू किया. वे प्रतिदिन ऋषियों की कुटियों के आसपास सफाई करतीं. हवन के लिए लकड़ियां एकत्र करतीं. यह सब वे बिना किसी अपेक्षा के करती थीं. लंबे समय तक किसी को पता नहीं चला कि यह सेवा कौन कर रहा है. एक दिन ऋषियों ने उन्हें देख लिया और उनसे परिचय पूछा. श्रमणा ने अपनी पूरी कथा उन्हें बता दी. तब महर्षि मातंग ने उन्हें अपने आश्रम में शरण दी और पुत्री के रूप में स्वीकार किया.

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राम-भक्ति की दीक्षा

माता शबरी ने गुरु मातंग की सेवा पूरे मन से की. वे आश्रम के नियमों का पालन करती रहीं. जब गुरु मातंग का अंतिम समय निकट आया, तब शबरी अत्यंत दुखी हो गईं. उन्होंने पूछा कि गुरु के बाद उनके जीवन का उद्देश्य क्या होगा. तब मातंग ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान श्री राम वनवास के दौरान इस स्थान पर आएंगे. उन्होंने शबरी को आज्ञा दी कि वे धैर्यपूर्वक उनकी प्रतीक्षा करें.

भगवान राम की प्रतीक्षा

माता शबरी ने गुरु की आज्ञा को अपने जीवन का व्रत बना लिया. वे प्रतिदिन मार्ग की सफाई करतीं. जंगल से फल लातीं. फल को चखकर सुनिश्चित करतीं कि वह मीठा और खाने योग्य हो. उनका पूरा जीवन श्री राम की प्रतीक्षा में बीत गया. वर्षों तक उन्होंने यही साधना की.

भगवान राम से शबरी का मिलन

वनवास के समय भगवान श्री राम, लक्ष्मण के साथ शबरी की कुटिया पहुंचे. शबरी ने अत्यंत प्रेम से उनका स्वागत किया. उन्होंने मीठे बेर भगवान को अर्पित किए. भगवान राम ने शबरी की भक्ति को देखा. उन्होंने प्रेमपूर्वक बेर स्वीकार किए. यह प्रसंग सच्ची भक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है. शबरी ने श्री राम को वानरराज सुग्रीव के विषय में बताया. आगे चलकर सुग्रीव ने माता सीता की खोज में राम की सहायता की.

माता शबरी का जीवन संदेश

माता शबरी का जीवन भक्ति, गुरु-निष्ठा, धैर्य और विश्वास का उदाहरण है. उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के भगवान की प्रतीक्षा की. शबरी जयंती हमें याद दिलाती है कि भगवान को पाने का मार्ग सरल है. सच्चा मन और निष्कलंक प्रेम ही सबसे बड़ी पूजा है.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.