राजा बलि ने इंद्र से छीन लिया स्वर्ग
एक बार दानवों और देवताओं में भीषण युद्ध छिड़ गया, जो बारह वर्षों तक चलता रहा। इस युद्ध में दानवों के राजा बलि ने देवताओं को पराजित कर इंद्र को स्वर्ग से बाहर कर दिया। राजा बलि भगवान विष्णु के महान भक्त प्रह्लाद जी के पोते थे। राजा बलि स्वयं भी एक महान विष्णु उपासक थे। तीनों लोकों को जीतने के उपलक्ष्य में राजा बलि ने गुरु शुक्राचार्य के कहने पर विजय यज्ञ करवाया। उधर स्वर्ग विहीन हो कर इंद्र यहां-वहां भटक रहे थे। वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और बोले, “हे जनार्दन! यह स्वर्ग आपने हमें दिया था। हम देवता स्वर्ग के बिना कुछ भी नहीं हैं। हम शक्तिहीन और श्रीहीन हो गए हैं। हमारी व्यथा दूर करें प्रभो!”भगवान विष्णु का वामनावतार
तीन पग भूमि
राजा बलि के इतना कहते ही विष्णुरूपी भगवान वामन का आकार बढ़ना शुरू हो गया। उनके आकार ने अंतरिक्ष के छोर को छू लिया था। उन्होंने अपने दो पग में ही पृथ्वी, आकाश और ब्रह्मांड को नाप लिया था। उन्होंने राजा बलि से पूछा, “हे दानवेंद्र! अब मैं अपना तीसरा पांव कहां रखूं?” इस पर राजा बलि भगवान वामन को प्रणाम करते हुए कहा, “हे प्रभु! आप अपना तीसरा पग में मेरे सिर पर रखें.” भगवान वामन ने ऐसा ही किया और राजा बलि के सिर पर पांव रखकर उसे पाताल लोक भेज दिया।राजा बलि के पहरेदार बने भगवान विष्णु
नारद जी ने बताया उपाय
जगतपालक भगवान विष्णु को वामनावतार के बाद फिर वैकुंठ जाना था। लेकिन बहुत दिन हो गए, वैकुंठ के भगवान से रहित हो जाने एक कारण देवी लक्ष्मी चिंतित हो गईं। उन्होंने नारद जी से पूछा, "हे देवर्षि! आपका तो तीनों लोकों में आना-जाना है। हमारे शेषशय्याधारी भगवान कहां हैं, कहीं देखा आपने? तब नारदजी बोले, "हे देवी! नारायण प्रभु तो पाताल लोक में राजा बलि के पहरेदार बने हुए हैं।" फिर माता लक्ष्मी को उन्होंने भगवान को वहां से मुक्त कर वापस लाने का एक उपाय भी बताया।धन-धान्य से भर उठा पाताल लोक
तब देवी लक्ष्मी एक ब्राह्मण स्त्री के रूप में धरती पर उतरीं और राजा बलि के पास पहुंचीं। उन्होंने रोते हुए बलि से कहा, "हे राजन! मेरे पति एक काम से लंबे समय के लिए बाहर गए हैं। मेरा कोई भाई नहीं है, इसलिए मैं दुखी हूं। मुझे रहने के लिए जगह चाहिए।" राजा बलि ने उनका हृदय से स्वागत किया और अपनी धर्म-बहन के रूप में उनकी रक्षा की। देवी लक्ष्मी के आगमन के बाद से बलि का पाताल लोक अचानक सुख, धन-धान्य, समृद्धि और ऐश्वर्य से खिल उठा।राजा बलि को बांधा रक्षा सूत्र
ऐसे शुरू हुआ रक्षा बंधन
अपने वचन से बंधे होने से राजा बलि ने भगवान विष्णु को उन्हें वापस कर दिया। देवी लक्ष्मी अपने पति को साथ लेकर वैकुंठ आ गईं। जिस दिन यह घटना घटी थी, वह श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। कहते हैं, तभी से यह तिथि रक्षा बंधन के लिए शुभ माना गया है, जो बाद में जन-जन में लोकप्रिय हुआ। इसलिए आज भी बहनें अपने भाइयों को राखी बांधती हैं, उनकी लंबी उम्र और सुख की कामना करती है। बदलें में भाई अपनी बहन की रक्षा का वचन और उपहार आदि देते हैं। ये भी पढ़ें: मौसी ने भतीजे को मार कर तालाब में फेंका, मां को नहीं पड़ा कुछ भी फर्क, भगवान शिव हुए क्रोधित…जानें एक अद्भुत कथा ये भी पढ़ें: समुद्र में डूबी द्वारिका, भगवान कृष्ण की मृत्यु के बाद उनकी पत्नियों का क्या हुआ…जानें पूरी कथा
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।