Puri Dola Utsav: पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला दोल उत्सव, उड़ीसा की संस्कृति का एक अद्भुत प्रतीक है. इसे दोल पूर्णिमा या दोल यात्रा भी कहते हैं. यह पर्व केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि वसंत ऋतु के आगमन और होली की शुरूआत का संदेश भी देता है. भक्तों के लिए यह दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के साथ सीधे मिलन का अवसर होता है.

भगवान का सजीव रूप – सुना बेसा

इस दिन देवता अपने भव्य स्वर्ण आभूषण में सजे होते हैं, जिसे 'सुना बेसा' या 'राजराजेश्वर वेश' कहते हैं. यह दृश्य देखने मात्र से भक्तों का मन आनंद और श्रद्धा से भर उठता है. भगवान को झूले पर विराजमान देखकर श्रद्धालु अबीर और गुलाल के साथ होली खेलते हैं. यह त्यौहार राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम और भक्ति का प्रतीक भी माना जाता है.

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दोल बेदी और शोभायात्रा

उत्सव की शुरुआत मंदिर के बाहरी दोल बेदी से होती है. यहां भगवान को विशेष झूले पर विराजमान किया जाता है. इसके बाद दोला गोविंद और देवी-देवताओं की शोभायात्रा मंदिर परिसर में निकाली जाती है. हर तरफ भक्तों की भक्ति, संगीत और रंग-बिरंगे फूलों की सजावट इसे और भी अद्भुत बना देती है.

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बसंत में रंगों का उत्सव

डोले में विराजमान भगवान के साथ भक्त होली खेलते हैं. गुलाल, अबीर और फूलों से मंदिर परिसर रंग-बिरंगा हो जाता है. इसे बसंतोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है. यह दिन केवल भक्ति का ही नहीं, बल्कि सामाजिक मिलन और उल्लास का भी प्रतीक है.

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धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

दोल उत्सव भगवान कृष्ण की लीलाओं और प्रह्लाद कथा की याद दिलाता है. बुराई पर अच्छाई की जीत, भक्ति का महत्व और प्रेम की भावना इस पर्व में उजागर होती है. विशेष रूप से यदि इस वर्ष चंद्र ग्रहण हो, तो मंदिर में पूजा और अनुष्ठान के समय में बदलाव आ सकता है, इसलिए श्रद्धालुओं को इसका ध्यान रखना आवश्यक है.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.