Panch Kedar Teerth: हिमालय की गोद में बसे पंचकेदार धाम हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. अब बाबा तुंगनाथ और मद्महेश्वर धाम के कपाट खुलने की तिथियां घोषित होते ही केदारघाटी में उत्साह का माहौल है. आस्था, परंपरा और पौराणिक कथा से जुड़ी यह यात्रा न केवल धार्मिक, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव भी देती है. आइए जानते हैं, कब खुलेंगे तुंगनाथ और मद्महेश्वर धाम के कपाट और पांडव और भगवान शिव से जुड़ी कथा क्या है?

कपाट खुलने की तिथियां तय

रुद्रप्रयाग जिले स्थित तृतीय केदार तुंगनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल को खोले जाएंगे. इससे पहले 20 अप्रैल को भगवान की उत्सव डोली मक्कूमठ स्थित शीतकालीन गद्दी स्थल मार्कण्डेय मंदिर से धाम के लिए रवाना होगी.

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वहीं, द्वितीय केदार मद्महेश्वर धाम के कपाट 21 मई को विधि-विधान के साथ खुलेंगे. इसकी उत्सव डोली 19 मई को ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ से प्रस्थान करेगी. इन तिथियों के ऐलान के बाद पूरे क्षेत्र में खुशी की लहर है.

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गौरीमाई मंदिर भी खुला

गौरीकुंड स्थित मां गौरीमाई मंदिर के कपाट भी श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं. छह महीने तक यहां नियमित पूजा और दर्शन होंगे. यह स्थान केदारनाथ यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है.

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ऐसे हुई पंचकेदार की उत्पत्ति

पंचकेदार की उत्पत्ति महाभारत काल से जुड़ी है. युद्ध के बाद पांडव अपने ही संबंधियों की हत्या के पाप से व्याकुल थे. महर्षि व्यास की सलाह पर वे भगवान शिव की खोज में हिमालय पहुंचे. शिव उनसे रुष्ट थे. उन्होंने गुप्तकाशी में बैल का रूप धारण कर लिया और पशुओं के बीच छिप गए. पांडवों को जब इसका आभास हुआ, तो भीम ने विशाल रूप लेकर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिए.

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सभी पशु निकल गए, पर शिव रूपी बैल वहीं रुक गए. भीम ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, तभी शिव धरती में समाने लगे. भीम ने बैल की पीठ का कूबड़ थाम लिया. पांडवों की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पाप मुक्त किया. इसके बाद शिव के शरीर के पांच अंग अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए. यही पांच स्थान पंचकेदार कहलाए.

क्या है तुंगनाथ का अर्थ?

तुंगनाथ वह स्थान है जहां भगवान शिव की भुजाएं प्रकट हुई थीं. ‘तुंग’ का अर्थ ऊंचा और ‘नाथ’ का अर्थ भगवान होता है. यह दुनिया का सबसे ऊंचाई पर स्थित शिव मंदिर माना जाता है. मान्यता है कि पांडवों ने ही यहां मंदिर का निर्माण कराया था. आज भी यह स्थल कठिन यात्रा के बावजूद भक्तों को आकर्षित करता है.

यह की शीतकालीन परंपरा है खास

हर वर्ष सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. तुंगनाथ धाम के कपाट 5 नवंबर 2026 को 189 दिनों की पूजा के बाद बंद हुए थे. इसके बाद डोली मक्कूमठ पहुंची, जहां छह माह तक पूजा होती रही. मद्महेश्वर के कपाट 18 नवंबर 2026 को बंद हुए थे. डोली गौंडार, रांसी और गिरिया होते हुए ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ पहुंची. इसी स्थान पर सर्दियों में भक्त दर्शन करते हैं.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.