Muharram 2026: इस्लाम धर्म में मुस्लिम लोग रमजान के पाक महीने में रोजा रखते हैं. रमजान में रोजे रखना बहुत ही अच्छा माना जाता है. रोजे के बाद ईद का पर्व मनाया जाता है. रमजान के अलावा भी मुस्लिम लोग रोजा रखते हैं. इन्हें नफिल रोजा कहते हैं. रमजान का महीना रोजा रखने के लिए खास होता है. इसके अलावा अल्ला की इबादत करने और अल्लाह को खुश करने के लिए अपनी मर्जी से रोजा रखा जाता है. इसे ही नफिल रोजा कहते हैं. अल्लाह कर इबादत कर सवाब पाने के लिए मुस्लिम लोग नफिल रोजा रखते हैं.
नफिल रोजा क्यों है इतना खास?
रोजा रखना इस्लाम धर्म के पांच स्तंभों में से एक है. रमजान के रोजे रखना बहुत ही जरूरी होता है. अगर कोई व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से रोजा रखने में सक्षम है, तो उसे रोजा जरूर रखना चाहिए. रमजान के रोजे को जानबूझकर छोड़ना गलत होता है. जबकि, नफिल रोजा अपनी मर्जी से रखा जाता है. इन नफिल रोजा रखने यानि अपनी मर्जी से रोजा रखने पर अधिक सवाब मिलता है. नफिल रोजे रखना धार्मिक अनिवार्यता नहीं है, इसे मर्जी से इबादत के लिए रखा जाता है.
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मुहर्रम में नफिल रोजा
इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, 9वें महीने रमजान में रोजे रखे जाते हैं. रमजान के दौरान मुस्लिम लोग दिनभर भूखे-प्यासे रहकर रोजा रखते हैं. रमजान से अलग मुहर्रम में नफिल रोजे रखे जाते हैं. मुस्लिम लोग मुहर्रम महीने में 9 और 10 तारीख या फिर 10 और 11 तारीख को रोजा रखते हैं. नफिल रोजा एक तरह से स्वैच्छिक उपवास होता है. नफिल रोजे से अधिक सवाब मिलता है.
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नफिल रोजे की खासियत
नफिल रोजे करने से अल्लाह की इबादत की जाती है. नफिल रोजे अल्लाह का प्रेम पाने के लिए किए जाते हैं. फर्ज में कमी की भरपाई और रोजों और नमाजों की कमी को पूरा करने के लिए नफिल रोजे किए जाते हैं. गुनाहों की माफी के लिए नफिल रोजे करना अच्छा होता है. नफिल रोजे रमजान के ठीक बाद 6 दिनों तक रख सकते हैं. मुहर्रम के दौरान नफिल रोजे रख सकते हैं. बकरीद से पहले जिलहिज्जा महीने में नफिल रोजे रख सकते हैं.
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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी इस्लामिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.