दिवाली को धन और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी की आराधना का पर्व माना जाता है. इस दिन देशभर के मंदिरों और घरों में मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है. लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि मध्य प्रदेश के रतलाम में एक ऐसा मंदिर है, जहां दिवाली के बाद प्रसाद के रूप में भक्तों को मिठाई या फल नहीं, बल्कि रुपये और सोने-चांदी के आभूषण दिए जाते हैं. इस मंदिर में करीब 300 साल से यह अनोखी परंपरा निभाई जा रही हैय मान्यता है कि यहां से प्रसाद के रूप में मिलने वाले धन को घर की तिजोरी में रखने से सालभर सुख-समृद्धि बनी रहती है.
प्रसाद के लिए मंदिर में लगती है श्रद्धालुओं की लंबी लाइन
मध्य प्रदेश के रतलाम शहर के मानक चौक इलाके में स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर अपनी इस खास परंपरा के लिए देशभर में प्रसिद्ध है. दिवाली और भाऊबीज के अवसर पर मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है. इस दौरान मां लक्ष्मी का श्रृंगार नोटों, सोने-चांदी के आभूषणों और सिक्कों से किया जाता है. मंदिर का पूरा परिसर नोटों और आभूषणों से सजाया जाता है.
दिवाली के अवसर पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में मंदिर पहुंचते हैं और मां लक्ष्मी के चरणों में रुपये, सोने-चांदी के आभूषण और सिक्के अर्पित करते हैं. इसके बाद भाऊबीज के दिन मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ जुटती है. इस दिन देवी को चढ़ाई गई धनराशि और कीमती सामान प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को दिया जाता है.
प्रसाद को खर्च नहीं करते श्रद्धालु
हैरानी की बात ये है कि मंदिर से मिलने वाले इस प्रसाद को लेकर श्रद्धालु खर्च नहीं करते. भक्तों के बीच ऐसी मान्यता है कि भाऊबीज पर मां लक्ष्मी से मिले रुपये को घर की तिजोरी या उस जगह रखते हैं, जहां उन्होंने अपना पैसा रखा हो. मान्यता है कि इससे अगले पूरे साल आर्थिक समृद्धि बनी रहती है और घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती. यही वजह है कि रतलाम के अलावा आसपास के जिलों और दूसरे राज्यों से भी लोग इस परंपरा में शामिल होने पहुंचते हैं.
रियासत काल से जुड़ा है 300 साल पुराना इतिहास
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस परंपरा की शुरुआत रतलाम रियासत के समय से चली आ रही है. मान्यता है कि रतलाम नगर के संस्थापक महाराजा रतन सिंह राठौड़ दिवाली और धनतेरस के अवसर पर मां लक्ष्मी के श्रृंगार के लिए राजकोष से सोने-चांदी के आभूषण और कीमती वस्तुएं भेंट करते थे. धीरे-धीरे इस परंपरा में आम श्रद्धालु भी शामिल होने लगे. इसके बाद देवी को अर्पित की गई संपत्ति को भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटने की प्रथा शुरू हुई, जो आज भी जारी है. इंदौर, उज्जैन और भोपाल से सड़क मार्ग के जरिए श्री महालक्ष्मी मंदिर पहुंचा जा सकता है.