Ravidas Jayanti 2026 Today: आज रविवार 1 फरवरी 2026 को संत रविदास जी की जयंती मनाई जा रही है। यह दिवस माघ पूर्णिमा के दिन आता है। ये भी कबीर की तरह काशी निवासी और भक्ति आंदोलन के संत थे, जिनको हम एक महान भक्त, दार्शनिक और समाज सुधारक के रूप में याद करते हैं। संत रविदास ने अपने जीवन में भक्ति ही नहीं की, बल्कि समाज में फैली कुरीतियों का भी सामना किया।

गुरु रविदास जी के समय समाज में जात-पात और भेदभाव खूब था। ऐसे में उन्होंने सभी जाति और वर्ग के लोगों को आदर, प्रेम और समानता का संदेश दिया। रविदास जी ने कहा कि इंसान का मूल्य उसके कर्मों से है, न कि जन्म से। उनका जीवन सरलता, सच्चाई और भक्ति का उदाहरण है। आइए जानते हैं, उनके 10 प्रमुख दोहे जो हमें भक्ति, एकता और मानवता का पाठ पढ़ाते हैं।

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दोहा 1

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।

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इस दोहा का अर्थ है: केले के पत्तों की तरह जाति-पात के भेद भी एक के ऊपर एक होते हैं। जब तक हम भेदभाव छोड़ेंगे नहीं, तब तक इंसान एक दूसरे से जुड़ नहीं सकते।

दोहा 2

रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।

इस दोहा का अर्थ है: किसी का नीच या उच्च होना उसके जन्म से नहीं नापना चाहिए। उसकी कर्मसूची ही असली पहचान है। नेक कर्म करने वाला ही महान है।

दोहा 3

हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस,
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।

इस दोहा का अर्थ है: ईश्वर जैसा अनमोल रत्न छोड़कर सांसारिक इच्छाओं में उलझना नर्क की ओर ले जाता है। सच्ची भक्ति ही जीवन का सार है।

दोहा 4

ऐसा चाहूँ राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न,
छोट-बड़ो सब सम रहें, रैदास रहे प्रसन्न।

इस दोहा का अर्थ है: रविदास जी एक ऐसे समाज की कल्पना करते थे जहां सभी को पर्याप्त भोजन मिले और कोई छोटा या बड़ा न महसूस करे। सभी में समानता हो।

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दोहा 5

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै,
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।

इस दोहा का अर्थ है: ईश्वर भक्ति को पाने के लिए भाग्य से ज्यादा विनम्रता जरूरी है। अहंकार को छोड़कर छोटे जीव की भांति साधारणता अपनाओ।

दोहा 6

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं,
तैसे ही अंतर नाहीं, हिंदूअन तुरकन माहि।

इस दोहा का अर्थ है: जैसे सोना और कंगन एक ही धातु के रूप हैं, वैसे हिंदू और मुस्लिम में भी कोई फर्क नहीं है। सब मनुष्य समान हैं।

दोहा 7

करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस,
कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास।

इस दोहा का अर्थ है: मनुष्य को अपने कर्मों में बंधा रहना चाहिए और उनके फल की केवल उम्मीद रखनी चाहिए। कर्म ही हमारे धर्म की पहचान है।

दोहा 8

क्रिस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा,
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।

इस दोहा का अर्थ है: ईश्वर के अलग-अलग नाम हो सकते हैं — कृष्ण, राम, हरि, करीम — पर मूल रूप से वह एक ही है। वेद, कुरान, पुराण सभी में सत्य और सदाचार का संदेश मिलता है।

दोहा 9

हिंदू तुरक नहीं, कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा,
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।

इस दोहा का अर्थ है: धर्म चाहे जो भी हो, सभी मनुष्य एक ही प्रकार का शरीर और हृदय रखते हैं। रविदास जी ने सभी को समान समझा।

दोहा 10

जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड में बास,
प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रैदास।

इस दोहा का अर्थ है: जब रविदास जी ने प्रेम और भक्ति को अपनाया, तो उन्होंने सार्थकता पाई। घृणा और नकारात्मकता से ऊपर उठकर प्रेम की भक्ति ही जीवन को उज्जवल बनाती है।

आज भी जीवंत रविदास जी का संदेश

आज जब हम रविदास जी के दोहे और उनके अर्थ को पढ़ते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि उनका संदेश समय-सीमा से परे है। जाति, धर्म, भेदभाव से ऊपर उठकर प्रेम, करुणा और सेवा का मार्ग यही हमें दिखाता है कि इंसानियत सबसे बड़ी पूजा है।

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.