Chaitra Navratri 2025: आज शनिवार 5 अप्रैल, 2025 को चैत्र नवरात्रि का आठवां दिन है। नवरात्रि की आठवीं तिथि मां दुर्गा के आठवें रूप मां महागौरी को समर्पित है। अष्टमी के दिन मां महागौरी की पूजा के साथ भक्त और साधक कन्या पूजन भी करते हैं। आइए जानते हैं, नवरात्रि के आठवें दिन की देवी मां महागौरी कौन है और महाअष्टमी कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त और नियम क्या हैं?
मां महागौरी कौन हैं?
पौराणिक कथा के अनुसार, जब शक्ति स्वरूपा मां पार्वती ने भगवान शिव शंकर को पति रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की, तब वे केवल कंदमूल, फल और पत्तों का ही आहार ग्रहण कर रही थीं। कुछ समय बाद, माता ने केवल वायु का सेवन करके अपनी तपस्या को और भी कठोर बना दिया, जिससे उनका शरीर दुर्बल हो गया और उनका रंग काला पड़ गया।
आखिरकार मां की इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगा की पवित्र जलधारा को मां के ऊपर प्रवाहित किया। जैसे ही जलधारा उनके ऊपर पड़ी, मां की आभा फिर से विद्युतप्रभा के समान हो गई और उनका रूप अत्यधिक कान्तिमान एवं गौरवर्ण से प्रकाशित हो गया। तभी से वे आदिशक्ति महागौरी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। मां महागौरी की चार भुजाए है, जिसमें अभयमुद्रा, वरमुद्रा, डमरू और त्रिशूल है। मां कृपावत्सल एवं सुख-संपत्ति की प्रदाता हैं और वे भक्त की प्रवृत्ति को सत्य की ओर ले जाती हैं।
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मां महागौरी मंत्र, प्रिय भोग और फूल
वंदना मंत्र: या देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
बीज मंत्र: श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:।
प्रार्थना मंत्र: श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचि:। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
प्रिय भोग: नवरात्रि की आठवीं पूजा के दिन यानी महाअष्टमी को काले चने का प्रसाद विशेष रूप से बनाया जाता है। यह प्रसाद शुद्धता, बल और शांति का प्रतीक माना जाता है। मां महागौरी को हलवा, पूड़ी, सब्जी और नारियल का भोग बेहद पसंद है।
प्रिय फूल: मां महागौरी की पूजा में बेल और चमेली के फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। यह जीवन में समृद्धि और सफलता का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
अष्टमी कन्या पूजन मुहूर्त
चैत्र नवरात्रि की महाष्टमी तिथि के दौरान कन्या पूजन करना विशेष रूप से फलदायी माना गया है। पंचांग के अनुसार, चैत्र नवरात्रि की अष्टमी तिथि 4 अप्रैल की रात 8:12 PM बजे से शुरू हुई है और इसका समापन आज यानी 5 अप्रैल को शाम 7:26 बजे होगा। महाअष्टमी पर कन्या पूजन का बहुत महत्व है। कन्या पूजन का सबसे शुभ आज सुबह 11:59 से लेकर दोपहर 12:29 तक रहेगा।
आयु के अनुसार कन्या पूजन का फल
नवरात्र के अवसर पर विशेष रूप से कन्याओं की पूजा की जाती है, जिसमें अष्टमी और नवमी के दिन 9 कन्याओं की पूजा होती है। हर एक कन्या का पूजन विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है और उनकी उम्र के अनुसार उनका रूप और प्रभाव भी भिन्न होता है।
- दो वर्ष की कन्या कुमारी मानी गई है, जिनका पूजन दुख और दरिद्रता को दूर करने वाला होता है।
- तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति रूप में प्रतिष्ठित होती हैं। त्रिमूर्ति कन्या के पूजन से धन-धान्य की प्राप्ति होती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
- चार वर्ष की कन्या कल्याणी कही जाती है। इनकी पूजा से परिवार का कल्याण होता है।
- पांच वर्ष की कन्या रोहिणी का रूप माना जाता है। रोहिणी का पूजन करने से व्यक्ति को रोगमुक्ति मिलती है।
- छह वर्ष की कन्या कालिका रूप होती हैं। कालिका रूप की कन्या की पूजा से विद्या, विजय और राजयोग की प्राप्ति होती है।
- सात वर्ष की कन्या चंडिका रूप मानी गई हैं। चंडिका रूप का पूजन ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
- आठ वर्ष की कन्या शाम्भवी कहलाती हैं। शाम्भवी कन्या की पूजा व्यक्ति को वाद-विवाद में विजय दिलाती है।
- नौ वर्ष की कन्या को दुर्गा रूप माना गया है। दुर्गा रूप की कन्या के पूजन से शत्रुओं का नाश होता है और असाध्य कार्य पूर्ण होते हैं।
- दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा कहते हैं। सुभद्रा रूप की कन्या अपने भक्तों के सभी मनोरथ पूर्ण करती है।
इस प्रकार, नवरात्रि के नौ दिनों में कन्याओं का पूजन विशेष रूप से शुभ और फलदायी माना जाता है और हर कन्या के पूजन से अलग-अलग प्रकार के लाभ होते हैं।
नवरात्रि कन्या पूजन के नियम
- कन्याओं को कन्या भोज के लिए सम्मान के साथ घर बुलाएं। कुल 9 कन्याओं और 1 बालक (भैरव भैया) को आमंत्रित करें।
- कन्याओं के घर आने पर, पहले उनके हाथ और पैरों को दूध या पानी से धोएं। फिर कन्याओं के पैरों को छूकर उनसे आशीर्वाद लें।
- कन्याओं को तैयार किए गए आसन पर बिठाएं। उनके माथे पर तिलक और अक्षत लगाएं। कन्याओं के हाथों में कलावा बांधें।
- अब कन्याओं की आरती करें। आरती करने के बाद कन्याओं के समक्ष भोजन परोसें।
- माता रानी का नाम लेकर कन्याओं से भोजन करने के लिए अनुरोध करें।
- यदि किसी कन्या की थाली में भोजन खत्म हो जाए तो पुनः उनकी थाली में भोजन परोसें।
- कन्याओं के भोजन के बाद उन्हें उपहार भेंट करें।
अंत में, सभी कन्याओं और बालक का पांव छूकर आशीर्वाद लें और विदाई करते समय कन्याओं और बालक से अपनी भूल-चूक की क्षमा मांगें। इन सभी नियमों को पालन करने के बाद नवरात्रि कन्या पूजन पूर्ण माना जाता है।
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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।
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