आसनसोल, पश्चिम बंगाल
एक ओर जहां पूरा देश रंग और गुलाल के साथ होली मना रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल के आसनसोल में रहने वाला आदिवासी समाज इस पर्व को बिल्कुल अलग और पारंपरिक तरीके से मनाता है. यहां होली रंगों से नहीं, बल्कि फूल और पानी के साथ मनाई जाती है. इस पर्व को ‘बाहा पर्व’ कहा जाता है.
तीन दिनों तक चलता है बाहा पर्व
आदिवासी समाज का यह पर्व तीन दिनों तक चलता है और इसमें कई कड़े नियमों का पालन किया जाता है. इस उत्सव में बाहरी यानी अन्य जाति या समुदाय के लोगों की भागीदारी नहीं होती. समाज के लोग इसे अपनी परंपरा और आस्था के अनुसार ही मनाते हैं.
बाहा का अर्थ है ‘फूल’
आदिवासी समाज प्रकृति पूजक होता है. ‘बाहा’ का अर्थ होता है फूल. फाल्गुन के महीने में जब पेड़ों पर नए फूल, मंजर और फल आते हैं, तब बाहा पर्व तक संताली समाज के लोग न तो नए फूल खाते हैं और न ही फल. होली से एक दिन पूर्व पारंपरिक रूप से बाहा पर्व मनाया जाता है. यह चैत्र मास में मनाए जाने वाले ‘दिशोम बाहा’ की शुरुआत भी माना जाता है.
नवदंपति के लिए विशेष अनुष्ठान
संताली परंपरा के अनुसार, जिन नवदंपतियों का विवाह एक वर्ष पूर्व हुआ होता है, उनके उसी मंडप (मड़वा) में चंगना (छोटी मुर्गी) की बलि दी जाती है. यह अनुष्ठान दंपति के सुखी वैवाहिक जीवन और वंश वृद्धि की कामना के लिए किया जाता है.
इस दौरान तीन मुर्गियों की बलि दी जाती है—एक जाहेर थान (ग्राम देव स्थल) के नाम, एक गांव के नाम और एक स्वयं के नाम से.
अच्छी खेती और स्वास्थ्य की कामना
होली से एक दिन पूर्व ग्राम देवता की पूजा होती है. सुबह जाहेर थान में पारंपरिक पूजा की जाती है, जबकि रात्रि में समाज के लोग मरांग बुरु से पूरे वर्ष अच्छी खेती, बीमारियों से रक्षा और समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं.
इस दिन आदिवासी समाज के लोग घर में जमीन पर सोते हैं, जो उनकी आस्था और अनुशासन का प्रतीक है.
चूरुय चाली की परंपरा
बाहा पर्व से पहले ‘चूरुय चाली’ यानी गांव में भिक्षाटन की परंपरा निभाई जाती है. एकत्रित खाद्य सामग्री से खिचड़ी बनाई जाती है, जिसे पूरे गांव में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है. परंपरा के अनुसार इस विशेष प्रसाद को महिलाएं ग्रहण नहीं करती हैं.
रंग पूरी तरह वर्जित
बाहा पर्व में रंगों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित होता है. जब तक यह त्योहार संपन्न नहीं हो जाता, समाज के लोग रंगों से दूर रहते हैं. यहां तक कि मुख्य पुजारी, जिन्हें ‘नायकी’ कहा जाता है, पूरे फाल्गुन माह रंग से बचने के लिए घर से बाहर तक नहीं निकलते.
परंपरा और प्रकृति का संगम
जहां एक ओर आधुनिक होली रंग और उत्सव के साथ मनाई जाती है, वहीं आसनसोल का आदिवासी समाज बाहा पर्व के माध्यम से प्रकृति, परंपरा और अनुशासन का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है. यह पर्व न सिर्फ उनकी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखता है, बल्कि प्रकृति के प्रति उनके गहरे सम्मान को भी दर्शाता है.
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