नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 के माध्यम से संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत को भारतीय राजनीति में लैंगिक संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया जा रहा है. लेकिन, इस उत्साह और प्रतीकात्मक विजय के बीच कुछ बुनियादी प्रश्न हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. क्या यह आरक्षण वास्तव में महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त करेगा? या फिर यह “मुखिया पति” और “सरपंच पति” की तर्ज पर “विधायक पति” और “सांसद पति” जैसी एक नई राजनीतिक संस्कृति को जन्म देगा?
प्रतिनिधित्व का संकट: आंकड़ों की भाषा
भारत महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में दुनिया के निचले समूह में है. जो वैश्विक औसत लगभग 26.9% से काफी पीछे है. भारत की लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी तक लगभग 14-15 प्रतिशत के आसपास ही रही है. राज्य विधानसभाओं में यह आंकड़ा और भी कम है. विभिन्न राज्यों के विधानसभाओं में औसतन 9 से 10 प्रतिशत का ही महिलाओं के हिस्सेदारी रही है. बिहार जैसे राज्यों में तो कई बार यह संख्या 10 प्रतिशत से भी नीचे चली जाती है.
राजनीतिक दलों की टिकट वितरण प्रक्रिया पर नजर डालें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है. अधिकांश राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल अपने उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी 10 से 12 प्रतिशत के बीच ही रखते हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो शायद ही कोई दल 20 प्रतिशत के आंकड़े तक पहुंच पाता है. 33 प्रतिशत तो अभी भी एक दूर का लक्ष्य प्रतीत होता है. जबकि मतदान में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि हुई है, जो 2019-2024 में पुरुषों के बराबर हो गई है. कई राज्यों में तो पुरुषों के मुकाबले महिलाएं अधिक वोट करती है.
बिहार इसका सबसे सटीक उदाहरण है जहां वर्ष 2010 के बाद हर वर्ष के हर विधानसभा में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं ने अधिक वोट किया. इसके बावजूद राजनीतिक दल अपने संगठन और टिकट वितरण में महिलाओं को पर्याप्त स्थान देने को तैयार नहीं हैं, तो अचानक 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने पर वे उम्मीदवार कहां से लाएंगे?
संगठनात्मक ढांचा: महिलाओं की सीमित भागीदारी
राजनीतिक दलों के अंदरूनी ढांचे पर नजर डालें तो वहां भी महिलाओं की भागीदारी बेहद सीमित है. पार्टी के जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के संगठनों में महिलाओं की हिस्सेदारी शायद ही 15-20 प्रतिशत तक पहुंचती हो. निर्णय लेने वाले पदों पर यह संख्या और कम हो जाती है. इसका सीधा अर्थ है कि राजनीतिक प्रशिक्षण, अनुभव और नेतृत्व की जो स्वाभाविक प्रक्रिया होती है उसमें महिलाओं की भागीदारी पहले से ही सीमित रही है. ऐसे में यह अपेक्षा करना कि आरक्षण लागू होते ही बड़ी संख्या में प्रशिक्षित, सक्षम और स्वतंत्र महिला नेता सामने आ जाएंगी, यथार्थ से परे लगता है.
पंचायत मॉडल: एक चेतावनी
स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू हुए तीन दशक से अधिक समय हो चुका है. पंचायतों और नगर निकायों में आज लाखों महिलाएं निर्वाचित प्रतिनिधि हैं. यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है. लेकिन इसी के साथ एक सच्चाई भी जुड़ी है “प्रॉक्सी राजनीति” की. देश के कई हिस्सों में यह देखा गया है कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के पीछे वास्तविक निर्णय लेने वाला कोई पुरुष यानी पति, पिता या परिवार का अन्य सदस्य होता है. “मुखिया पति” और “सरपंच पति” जैसे शब्द इसी सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ से पैदा हुए हैं.
यह कहना गलत होगा कि सभी महिला प्रतिनिधि प्रॉक्सी हैं. कई उदाहरण ऐसे भी हैं जहां महिलाओं ने खुद को स्थापित किया है और स्वतंत्र नेतृत्व विकसित किया है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बड़ी संख्या में प्रतिनिधित्व अभी भी प्रतीकात्मक है.
संसद और विधानसभा: क्या दोहराई जाएगी वही कहानी?
अब जब यही मॉडल विधानसभा और संसद तक विस्तारित होने जा रहा है, तो स्वाभाविक है कि वही सवाल फिर उठे. क्या राजनीतिक दल सुरक्षित विकल्प के तौर पर अपने पुरुष नेताओं के परिजनों पत्नी, बेटी, बहू—को टिकट देंगे? क्या सत्ता का वास्तविक नियंत्रण उन्हीं पुराने राजनीतिक परिवारों के हाथ में रहेगा, केवल चेहरा बदल जाएगा? यह आशंका इसलिए भी मजबूत होती है क्योंकि भारतीय राजनीति में वंशवाद पहले से ही एक स्थापित प्रवृत्ति है. ऐसे में महिला आरक्षण, यदि सावधानीपूर्वक लागू नहीं किया गया, तो यह वंशवादी राजनीति को एक नया माध्यम भी दे सकता है.
क्या महिलाएं ‘तैयार’ नहीं हैं?
यह कहना कि महिलाएं राजनीतिक रूप से तैयार नहीं हैं, एक हद तक सही है लेकिन इसे पूरी सच्चाई नहीं माना जा सकता. महिलाओं को अवसर ही नहीं दिया गया, यह भी उतना ही बड़ा कारण है. राजनीति में प्रवेश के रास्ते छात्र राजनीति, पार्टी संगठन, स्थानीय निकाय इन सभी में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है. इसके बावजूद जब-जब महिलाओं को अवसर मिला है उन्होंने अपनी क्षमता साबित की है. पंचायत स्तर से लेकर संसद तक, अनेक महिला नेताओं ने स्वतंत्र पहचान बनाई है. इसलिए समस्या क्षमता की नहीं बल्कि अवसर और संरचना की है.
बदलाव का चरणबद्ध स्वरूप
नारी शक्ति वंदन अधिनियम का प्रभाव एक झटके में नहीं दिखेगा. यह एक लंबी सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत है. इसे तीन चरणों में समझा जा सकता है
- पहला चरण: प्रॉक्सी और परिवार-आधारित उम्मीदवारों की अधिकता. राजनीतिक दल जोखिम लेने से बचेंगे और परिचित चेहरों को प्राथमिकता देंगे.
- दूसरा चरण: निर्वाचित महिलाओं में से कुछ स्वयं निर्णय लेने लगेंगी. राजनीतिक अनुभव और आत्मविश्वास बढ़ेगा.
- तीसरा चरण: स्वतंत्र और सशक्त महिला नेतृत्व का उदय. यह वह अवस्था होगी जहां महिलाएं केवल प्रतिनिधि नहीं, बल्कि नीति-निर्माता के रूप में स्थापित होंगी.
राजनीतिक दलों की भूमिका
इस परिवर्तन की कुंजी राजनीतिक दलों के हाथ में है. यदि वे वास्तव में महिला सशक्तिकरण को गंभीरता से लेते हैं तो उन्हें अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करना होगा. महिला विंग को केवल औपचारिक इकाई न बनाकर उसे निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना होगा. छात्र राजनीति और जमीनी स्तर पर महिला नेतृत्व को बढ़ावा देना होगा. टिकट वितरण में प्रयोगधर्मिता और साहस दिखाना होगा. अन्यथा, यह आरक्षण केवल एक सांविधानिक प्रावधान बनकर रह जाएगा, जिसका वास्तविक प्रभाव सीमित होगा.
समाज की भूमिका
राजनीति समाज का प्रतिबिंब होती है. यदि समाज में महिलाओं को स्वतंत्र निर्णय लेने की आज़ादी नहीं है तो राजनीति में भी वह स्वतः नहीं आएगी. महिला शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक स्वीकृति—ये तीनों कारक राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए आवश्यक हैं. जब तक एक महिला घर के भीतर स्वतंत्र नहीं है, तब तक वह सार्वजनिक जीवन में भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हो सकती.
बहरहाल, नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक ऐतिहासिक अवसर है. यह भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. लेकिन यह मान लेना कि इसके लागू होते ही राजनीति में लैंगिक समानता स्थापित हो जाएगी, एक अतिशयोक्ति होगी. यथार्थ यह है कि शुरुआत में “विधायक पति” और “सांसद पति” जैसे शब्द सुनाई दे सकते हैं. यह भी संभव है कि कई जगहों पर प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक हो.
लेकिन यही प्रक्रिया आगे चलकर वास्तविक परिवर्तन का आधार भी बन सकती है. क्योंकि इतिहास गवाह है कि अधिकार पहले मिलते हैं फिर उनका सार्थक उपयोग बाद में सीखा जाता है. इसलिए यह अधिनियम एक अंत नहीं, बल्कि एक शुरुआत है, एक ऐसी शुरुआत, जिसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम इसे केवल कानून बनाकर छोड़ देते हैं या इसे सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का माध्यम बनाते हैं.
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं. न्यूज 24 किसी तथ्य की पुष्टि नहीं करता.
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