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मुख्यमंत्री का चेहरा और समय’ का सवाल: क्या भाजपा खुद को उलझा रही है?

बिहार में नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चाओं के बीच क्या भाजपा ने खुद को उलझा लिया है? जानिए क्यों सीएम चेहरे की तलाश और नीतीश के प्रति उमड़ती ‘सहानुभूति’ भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है. पढ़ें, राजनीतिक विश्लेषक प्रियदर्शी रंजन की रिपोर्ट

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Photo Credit: Gemini AI

बिहार की राजनीति में इन दिनों जो कुछ घटित हो रहा है, वह सिर्फ सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि यह समय और संकेत के बीच की उस सूक्ष्म राजनीति का उदाहरण है, जिसे समझने में अक्सर बड़ी-बड़ी पार्टियां भी चूक कर जाती हैं. लगभग तय माना जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा की ओर प्रस्थान करेंगे और उसके बाद मुख्यमंत्री पद से उनका प्रस्थान भी अवश्यंभावी है. इसके साथ ही यह भी स्पष्ट संकेत है कि सत्ता की बागडोर भाजपा के हाथों में जाएगी. लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—क्या भाजपा इस संक्रमण को संभालने के लिए तैयार है? या फिर वह अपने ही बनाए हुए समय-चक्र में फंसती जा रही है?

भाजपा के सामने समस्या भावी मुख्यमंत्री के नामों की नहीं है बल्कि समस्या उस एक नाम की है, जिस पर सभी सहमत हों. कई दावेदारों की मौजूदगी दरअसल, एक सशक्त चेहरे की अनुपस्थिति को ही उजागर करती है. राजनीति में कभी-कभी अधिक विकल्प ही सबसे बड़ी दुविधा बन जाते हैं. यही कारण है कि भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर हो रही देरी अब सिर्फ रणनीतिक चुप्पी नहीं रह गई है, बल्कि यह पार्टी के भीतर उभरती बेचैनी का कारण बन रही है. जब नेतृत्व स्पष्ट नहीं होता, तो महत्वाकांक्षाएं अपने-अपने तर्क गढ़ने लगती हैं. और यही वह बिंदु है जहां से गुटबाजी जन्म लेती है. भाजपा के भीतर यह दिख भी रहा है. केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश नेतृत्व भी शायद एक चेहरे पर एकमत नहीं है. वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पसंद और एनडीए के अन्य सहयोगी दलों पसंद को भी भाजपा टटोल रही है. ऐसे में कई नाम जो मुख्यमंत्री के तौर पर भाजपा के भीतर खुद को देख रहे हैं अपने_अपने गुटों को अपने पक्ष में लामबंदी करवाने के लिए सक्रिय कर दिया है.

इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है, जो भाजपा के लिए कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है. और खासकर नीतीश कुमार के प्रति उभरती सहानुभूति. जब कोई नेता, जिसने लंबे समय तक सत्ता संभाली हो, अचानक पीछे हटता हुआ दिखाई देता है, तो राजनीति में भावनाएं तर्क पर भारी पड़ने लगती हैं. समय बीतने के साथ यह सहानुभूति और गहरी हो सकती है. भाजपा की हर देरी इस नैरेटिव को मजबूत करती है कि नीतीश कुमार को किनारे किया जा रहा है. और यह भाव जदयू के कार्यकर्ताओं से लेकर आम मतदाता तक पहुंच सकता है.

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नीतीश कुमार की हालिया समृद्धि यात्रा ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि उनकी लोकप्रियता को कम करके आंकना राजनीतिक भूल हो सकती है. यह वह वास्तविकता है, जिसे आंकड़ों से नहीं, भीड़ का भीड़ का नीतीश कुमार से दिल्ली नहीं जाने का आग्रह से समझा जा सकता है. मुख्यमंत्री के कई कार्यक्रमों में यह देखा गया कि नीतीश कुमार को दिल्ली नहीं जान देने को लेकर लोग नारेबाजी कर रहे थे भावुक हो रहे हैं.
इसी बीच, आनंद मोहन जैसे नेताओं के बयान, एनडीए गठबंधन के भीतर उठते असहज सवालों को सार्वजनिक कर रहे हैं. एनडीए के भीतर यह असंतुलन अगर समय रहते नहीं संभाला गया, तो यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि विश्वास के संकट में भी बदल सकता है.

विपक्ष भी इस पूरे परिदृश्य को बहुत सावधानी से साध रहा है. नीतीश कुमार के प्रति दिख रही नरमी, दरअसल एक रणनीतिक निवेश है. ताकि उन्हें राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाए रखा जा सके. और इतिहास यह बताता है कि नीतीश कुमार ने हमेशा परिस्थितियों के अनुसार अपने निर्णयों को पुनर्परिभाषित किया है.
अंततः सवाल यही है—क्या भाजपा की यह देरी एक सुविचारित रणनीति है या फिर यह एक ऐसी राजनीतिक हिचकिचाहट है, जो आने वाले समय में भारी पड़ सकती है?
क्योंकि राजनीति में फैसले सिर्फ लिए नहीं जाते, वे समय पर लिए जाते हैं. और बिहार की राजनीति में जो समय को साध ले, वही सत्ता का साधक बनता है.

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नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं, न्यूज 24 किसी तथ्य की पुष्टि नहीं करता

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लेखक के बारे में

Vijay Jain

विजय कुमार न्यूज 24 में बतौर सीनियर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं. विजय कुमार ने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत प्रिंट मीडिया के साथ की. अपने 23 साल के करियर में वह दैनिक जागरण, अमर उजाला और दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं. विजय कुमार राजनीति, चुनाव, क्राइम और करंट अफेयर्स जैसे विषयों पर तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. विजय कुमार ने दैनिक भास्कर में रिपोर्टिंग के दौरान स्टिंग ऑपरेशन भी किए. 23 साल के अनुभव के दौरान विजय कुमार ने करियर के शुरुआती दौर में डेस्क जर्नलिस्ट रहते हुए की. विजय कुमार को 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के अलावा बिहार, यूपी, बंगाल, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव की ग्राउंड कवरेज का अनुभव है. ग्रामीण उद्योगीकरण में स्नातक की डिग्री होने के कारण विजय कुमार को ग्रामीण इलाकों की समस्याओं और उनसे जुड़ी कवरेज का खासा अनुभव है. अपने लेख के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण इलाकों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है. पत्रकारिता में अनुभव: 23 साल योग्यता, डिग्री / अन्य उपलब्धियां: शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से ग्रामीण उद्योगीकरण विषय में बीए की डिग्री प्राप्त की है. विजय कुमार को पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2017 में 'श्रीफल जर्नलिज्म नेशनल अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया.
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