Patanjali Traditional Organic Farming: कृषि प्रधान देश के रूप में भारत की पहचान की जाती है. यहां पर खेती ना सिर्फ आजीविका का साधन है, बल्कि संस्कृति और परंपरा का हिस्सा भी है. खेत और किसान के बिना भारत अपनी कल्पना भी नहीं कर सकता है. हालांकि, खेती में क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में काफी कुछ बदला है. आधुनिक तकनीकों और रासायनिक खेती ने किसानों को तात्कालिक लाभ तो दिया, लेकिन मिट्टी की सेहत, उत्पादन की गुणवत्ता और किसानों की लागत पर इसका नकारात्मक असर भी पड़ा है. ऐसे में अब एक बार फिर पारंपरिक खेती की ओर लौटने की पहल तेज हो रही है, जिसमें पतंजलि का रिसर्च अहम भूमिका निभा रहा है. पंतजलि की फार्म इस क्षेत्र में अपनी बहुत ही योगादाग दे रहा है और किसानों को आगे बदलती खेती के नए रास्ते बताने का काम कर रहा है.

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पारंपरिक खेती क्यों बन रही है फिर से लोकप्रिय?

पहले के समय में किसान बिना रसायनों के, गोबर खाद, प्राकृतिक कीटनाशक और देसी बीजों का इस्तेमाल करते थे. इससे जमीन की उर्वरता बनी रहती थी और फसल भी सुरक्षित होती थी. आज के दौर में बढ़ते प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्याओं के कारण लोग ऑर्गेनिक और प्राकृतिक उत्पादों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं. यही वजह है कि पारंपरिक खेती फिर से चर्चा में है और किसान भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं.

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पतंजलि का रिसर्च कैसे कर रहा है मदद?

पतंजलि द्वारा किए जा रहे शोध में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का मेल देखने को मिलता है. इसमें खासतौर पर इन बिंदुओं पर काम किया जा रहा है जैसे-

  • देसी बीजों का संरक्षण करना
  • प्राकृतिक खाद और जैविक उर्वरकों का इस्तेमाल करना
  • रसायन मुक्त खेती के तरीके बदलना
  • कम लागत में अधिक उत्पादन के उपाय

किसानों के लिए कैसे खुल रहे हैं आत्मनिर्भरता के रास्ते?

पतंजलि की पहल से किसानों को सिर्फ खेती के तरीके ही नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने का रास्ता भी मिल रहा है. इस दौरान कम लागत पर बड़े फायदे पर जोर दिया जा रहा है. वहीं, ऑर्गेनिक उत्पादों की मांग ज्यादा होने से बेहतर कीमत मिल रही हैं.

देसी खेती और आयुर्वेद का कनेक्शन क्या है?

पतंजलि का मानना है कि जिस तरह आयुर्वेद शरीर को प्राकृतिक तरीके से स्वस्थ रखता है, उसी तरह प्राकृतिक खेती भी जमीन और फसलों को स्वस्थ बनाए रखती है. इस सोच के साथ खेती में रसायनों के बजाय प्राकृतिक संसाधनों पर जोर दिया जा रहा है.

चुनौतियां का समाधान आसानी से मिलेगा

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पारंपरिक खेती अपनाने में कुछ चुनौतियां भी हैं, जैसे शुरुआती समय में उत्पादन में थोड़ा बदलाव, सही जानकारी की कमी और बाजार तक पहुंच, लेकिन पतंजलि जैसे संस्थान किसानों को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और बाजार से जोड़ने का काम कर रहे हैं, जिससे ये समस्याएं धीरे-धीरे कम हो रही हैं. पतंजलि के वैज्ञानिक शोध और 'किसान समृद्धि कार्यक्रम' के माध्यम से पारंपरिक खेती और आधुनिक जैविक तकनीकों का संगम हो रहा है.

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