आज की आधुनिक और चमकती मुंबई को देखकर शायद ही कोई अंदाजा लगा पाए कि बॉलीवुड के लिए मशहूर इस शहर की आर्थिक नींव 'सफेद सोने' यानी कॉटन पर टिकी थी. ब्रिटिश दौर (British Colonial) में मुंबई भारत की सबसे अहम कपास व्यापारिक केंद्र के रूप में उभरी थी. यहां कॉटन की खरीद, प्रोसेसिंग और निर्यात ने शहर को एक नई पहचान दी. यही कारण है कि मुंबई को आज 'कॉटन सिटी ऑफ इंडिया' कहा जाता है. कपास उद्योग ने न सिर्फ यहां रोजगार पैदा किया, बल्कि शहर की आर्थिक रफ्तार को भी तेज किया.
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ब्रिटिश काल में शुरू हुआ मुंबई में कॉटन का सफर
रिपोर्ट्स बताते हैं कि ब्रिटिश शासन के दौरान मुंबई में पहली सूती मिलों की स्थापना हुई. इसमें बॉम्बे स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी की शुरुआत ने देश और खासकर बॉम्बे ( आज का मुंबई) का इतिहास बदल दिया. इसके बाद देखते ही देखते दर्जनों टेक्सटाइल मिलें खुलीं, जिन्होंने इस शहर को एक नई पहचान देने में अहम भूमिका निभाई. इन मिलों में कॉटन से सूत और कपड़ा तैयार किया जाता था, जिसे देश और विदेश में भेजा जाता था. अमेरिका और यूरोप तक मुंबई का कपड़ा निर्यात होने लगा, जिससे शहर अंतरराष्ट्रीय व्यापार मानचित्र पर छा गया.
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बंदरगाह, रेल और बाजार ने दिया बढ़ावा
मुंबई के 'कॉटन सिटी' बनने में इसके बंदरगाह की भूमिका बहुत अहम रही. क्योंकि समुद्री रास्ते से कपास का आयात-निर्यात काफी आसान होता था. इसके साथ ही रेलवे नेटवर्क के विस्तार ने देश के अंदर से कच्चा माल लाने को सरल और तेज बना दिया. मुंबई की भौगोलिक स्थिति, मजबूत व्यापारिक बाजार और अंग्रेजी नीतियों ने कपड़ा उद्योग को तेजी से आगे बढ़ाया. इसका नतीजा ये हुआ कि इस उद्योग में काम करने वाले लाखों मजदूरों को एक अच्छा कमाने का जरिया मिला और शहर का तेजी से शहरीकरण हुआ.
भारतीय अर्थव्यवस्था में मुंबई का बड़ा योगदान
कपास और टेक्सटाइल उद्योग ने मुंबई को सिर्फ औद्योगिक शहर नहीं, बल्कि आर्थिक राजधानी बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाई. इसी उद्योग से बैंकिंग, बीमा और शेयर बाजार जैसी गतिविधियों को बढ़ावा मिला. हालांकि समय के साथ मिलें बंद हुईं, लेकिन उनका योगदान आज भी मुंबई की पहचान में शामिल है. 'कॉटन सिटी' के रूप में मुंबई की यह विरासत भारतीय औद्योगिक इतिहास का एक हिस्सा है.
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