हरियाली तीज सिर्फ व्रत और पूजा का त्योहार नहीं है, बल्कि यह सावन की हरियाली, महिलाओं की आपसी मेल-जोल और लोक संस्कृति से जुड़ा एक खूबसूरत पर्व भी रहा है. पुराने समय में तीज आते ही गांवों और कस्बों में अलग ही रौनक दिखाई देती थी. पेड़ों पर झूले पड़ते, महिलाएं और लड़कियां समूह में इकट्ठा होकर सावन के लोकगीत गातीं और मेहंदी-श्रृंगार के साथ त्योहार का आनंद लेती थीं. हालांकि, अब पहले जैसी बात नहीं है, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि तीज का त्योहार सेलिब्रेट नहीं किया जाता. बस अब उन इमोशन के साथ यह फेस्टिवल मनाया नहीं जाता. कई जगहों पर वे परंपराएं अब पहले जैसी दिखाई नहीं देतीं, जो कभी इस त्योहार की पहचान हुआ करती थीं.
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पेड़ों पर झूले डालने की परंपरा
तीज और झूले का रिश्ता बहुत पुराना है. सावन आते ही घर के आसपास मौजूद बड़े पेड़ों की मजबूत डालियों पर रस्सी और लकड़ी के पटरे से झूले बांधे जाते थे. महिलाएं अपनी सखियों के साथ यहां पर बैठकर लुत्फ उठाया करती हैं. बारी-बारी से झूला झूलतीं और गीत गाती थीं, जिसे अब मॉर्डन तरीके से अपनाया जा रहा है. जगह कम होने की वजह से घरों में छोटे झूले लगा लिए जाते हैं.
सावन के लोकगीतों की जगह लेता संगीत
तीज के लोकगीत की बात ही अलग है. इस पर्व की सबसे खास सांस्कृतिक पहचान है. इस दौरान महिलाएं मिलकर सावन, मायके, ससुराल, प्रेम और रिश्तों से जुड़े पारंपरिक गीत गाती थीं. इन गीतों में उस समय के सामाजिक जीवन और महिलाओं का इमोशन हुआ करते थे. हालांकि,अब इस रिवाज में काफी बदलाव आए हैं, लोग फिल्मी गानों और रिकॉर्डिंग म्यूजिक का इस्तेमाल करते है.
सहेलियों का मिलना
पहले तीज महिलाओं के लिए एक तरह का सामाजिक मिलन भी हुआ करता था. पड़ोस और परिवार की महिलाएं एक जगह इकट्ठा होतीं, साथ में झूला झूलतीं, गीत गातीं, मेहंदी लगातीं और त्योहार की खुशियां एक दूसरे को बताती थी. आज महिलाएं अपने लिए नहीं वक्त नहीं निकाल पाती हैं.
मायके से आने वाला ‘सिंधारा’
तीज का एक बेटी को उपहार, जिसमें मायके से बेटी के लिए सारा सामान आता हैं. उपहार में कपड़े, मिठाई, घेवर, मेहंदी, चूड़ियां और श्रृंगार का सामान आता है. इसे ‘सिंधारा’ कहा जाता है. कई क्षेत्रों में आज भी यह परंपरा निभाई जाती है, लेकिन बहुत सारी जगह यह रिवाज खत्म होता जा रहा है.
घर पर होने वाली पारंपरिक तैयारियां
पुराने जमाने के मुकाबले अब काफी कुछ बदला है. पहले तीज की तैयारी सिर्फ बाजार से सामान खरीदने तक नहीं थी, बल्कि महिलाएं घर पर मेहंदी लगाती थीं, पारंपरिक पकवान और पूजा की तैयारियां परिवार के साथ मिलकर करती थीं. आज रेडीमेड और ऑनलाइन खरीदारी ने इन तैयारियों को काफी आसान बना दिया है.
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