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तीज के झूले से लेकर लोकगीतों तक, इस त्योहार की कौन सी पुरानी परंपराएं हो रही हैं गायब?

तीज बहुत ही खूबसूरत त्योहार है, जिसकी कई प्रथाएं लोकप्रिय हैं. कुछ सदियों से चलती आ रही हैं और कुछ वक्त के साथ खत्म होती दिखाई दीं. आइए इससे जुड़ी कुछ लोक परंपराओं के बारे में जानते हैं. 

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पेड़ों पर झूले डालने की परंपरा. Image Credit- AI

हरियाली तीज सिर्फ व्रत और पूजा का त्योहार नहीं है, बल्कि यह सावन की हरियाली, महिलाओं की आपसी मेल-जोल और लोक संस्कृति से जुड़ा एक खूबसूरत पर्व भी रहा है. पुराने समय में तीज आते ही गांवों और कस्बों में अलग ही रौनक दिखाई देती थी. पेड़ों पर झूले पड़ते, महिलाएं और लड़कियां समूह में इकट्ठा होकर सावन के लोकगीत गातीं और मेहंदी-श्रृंगार के साथ त्योहार का आनंद लेती थीं. हालांकि, अब पहले जैसी बात नहीं है, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि तीज का त्योहार सेलिब्रेट नहीं किया जाता. बस अब उन इमोशन के साथ यह फेस्टिवल मनाया नहीं जाता. कई जगहों पर वे परंपराएं अब पहले जैसी दिखाई नहीं देतीं, जो कभी इस त्योहार की पहचान हुआ करती थीं. 

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पेड़ों पर झूले डालने की परंपरा

तीज और झूले का रिश्ता बहुत पुराना है. सावन आते ही घर के आसपास मौजूद बड़े पेड़ों की मजबूत डालियों पर रस्सी और लकड़ी के पटरे से झूले बांधे जाते थे. महिलाएं अपनी सखियों के साथ यहां पर बैठकर लुत्फ उठाया करती हैं. बारी-बारी से झूला झूलतीं और गीत गाती थीं, जिसे अब मॉर्डन तरीके से अपनाया जा रहा है. जगह कम होने की वजह से घरों में छोटे झूले लगा लिए जाते हैं. 

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सावन के लोकगीतों की जगह लेता संगीत

तीज के लोकगीत की बात ही अलग है. इस पर्व की सबसे खास सांस्कृतिक पहचान है. इस दौरान महिलाएं मिलकर सावन, मायके, ससुराल, प्रेम और रिश्तों से जुड़े पारंपरिक गीत गाती थीं. इन गीतों में उस समय के सामाजिक जीवन और महिलाओं का इमोशन हुआ करते थे. हालांकि,अब इस रिवाज में काफी बदलाव आए हैं, लोग फिल्मी गानों और रिकॉर्डिंग म्यूजिक का इस्तेमाल करते है. 

सहेलियों का मिलना 

पहले तीज महिलाओं के लिए एक तरह का सामाजिक मिलन भी हुआ करता था. पड़ोस और परिवार की महिलाएं एक जगह इकट्ठा होतीं, साथ में झूला झूलतीं, गीत गातीं, मेहंदी लगातीं और त्योहार की खुशियां एक दूसरे को बताती थी. आज महिलाएं अपने लिए नहीं वक्त नहीं निकाल पाती हैं. 

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मायके से आने वाला ‘सिंधारा’

तीज का एक बेटी को उपहार, जिसमें मायके से बेटी के लिए सारा सामान आता हैं. उपहार में कपड़े, मिठाई, घेवर, मेहंदी, चूड़ियां और श्रृंगार का सामान आता है. इसे ‘सिंधारा’ कहा जाता है. कई क्षेत्रों में आज भी यह परंपरा निभाई जाती है, लेकिन बहुत सारी जगह यह रिवाज खत्म होता जा रहा है. 

घर पर होने वाली पारंपरिक तैयारियां

पुराने जमाने के मुकाबले अब काफी कुछ बदला है. पहले तीज की तैयारी सिर्फ बाजार से सामान खरीदने तक नहीं थी, बल्कि महिलाएं घर पर मेहंदी लगाती थीं, पारंपरिक पकवान और पूजा की तैयारियां परिवार के साथ मिलकर करती थीं. आज रेडीमेड और ऑनलाइन खरीदारी ने इन तैयारियों को काफी आसान बना दिया है.

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लेखक के बारे में

Shadma Muskan

शादमा मुस्कान न्यूज 24 डिजिटल में सीनियर सब एडिटर हैं और हेल्थ व लाइफस्टाइल बीट कवर करती हैं. शादमा ने दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज से BJMC और दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस से पीजी डिप्लोमा किया है. उन्होंने गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार से MJMC की पढ़ाई भी की है. शादमा को पत्रकारिता के क्षेत्र में 5 साल से ज्यादा का अनुभव है. शादमा ने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका और हरिभूमि में इंटर्नशिप से की. इसके बाद, उन्होंने जागरण न्यू मीडिया की वेबसाइट हरज़िंदगी के साथ 4 साल से अधिक समय तक काम किया, जहां उन्होंने हेल्थ और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों पर लेखन किया. इस दौरान उन्होंने ब्यूटी, फैशन, फूड, होम रेमेडीज, गार्डनिंग, होम डेकोर और पेरेंटिंग जैसे विषयों पर भी काम किया. इस अनुभव के दौरान शादमा ने अलग-अलग क्षेत्रों के कई विशेषज्ञों के साथ काम किया है. एक्सपर्ट ओपीनियन के आधार पर वह रीडर्स तक सटीक और आसान शब्दों में चीजों को पहुंचाने का काम कर रही हैं. कुल अनुभव - 5 साल पिछला अनुभव- शादमा ने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की. इसके बाद तहजीब टीवी, हरिभूमि और जागरण न्यू मीडिया की वेबसाइट के साथ चार साल तक हेल्थ और लाइफस्टाइल पर लिखा. किस क्षेत्र में महारत शादमा मुस्कान को लाइफस्टाइल, ट्रैवल, फूड और हेल्थ से जुड़े विषयों के बारे में काफी अच्छी जानकारी है. इसके अलावा शादमा को फूड रिव्यू, किचन गाइड, फैशन टिप्स, शॉपिंग गाइड, ब्यूटी, रिलेशनशिप और इंटीरियर पर वह विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर लिखती हैं.
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