लोकतंत्र में यह अधिकार सभी को है कि असहमति जताएं, विरोध करें लेकिन जब यही विरोध सच और झूठ के बीच का फासला मिटाकर सिर्फ सत्ता को बदनाम करने का हथियार बन जाए, तो यह खतरनाक संकेत है. पिछले कुछ दिनों में उत्तर प्रदेश में जो कुछ हुआ, वह इसी खतरनाक प्रवृत्ति का प्रमाण है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार, जिसने कानून-व्यवस्था से लेकर विकास तक अनेक मोर्चों पर उल्लेखनीय काम किया है, उसे बदनाम करने के लिए सुनियोजित तरीके से घटनाएं गढ़ी गईं और फिर सोशल मीडिया के माध्यम से जनता को भ्रमित करने की कोशिश की गई. यह सिर्फ एक सरकार पर हमला नहीं, बल्कि प्रदेश की छवि और आम जनता के विश्वास पर हमला है और कम से कम ऐसा करने वालों को खुद को अपने ही आईने में परखना चाहिए.
सबसे पहले बात करते हैं काशी की, जो कम गंभीर नहीं. वहां के शिवाला, सरायनंदन, नगवा समेत आधा दर्जन वार्डों में सीवर लाइनों की सफाई के दौरान मुख्य सीवर लाइनों के भीतर से बालू-सीमेंट की बोरियां, लकड़ी का बुरादा, पत्थर, प्लाई और प्लास्टिक की सामग्री बरामद हुई. सीवर के अंदर सीमेट व बालू की बोरियां? क्या यह सामान्य लगता है? यह स्पष्ट रूप से जानबूझकर सीवर लाइनों को अवरुद्ध करने का प्रयास प्रतीत होता है. सीमेंट से भरी बोरियां किसी बड़ी साजिश की ओर स्पष्ट संकेत करती हैं. उद्देश्य भी साफ है कि जब मुख्य मार्ग की सीवर लाइन जाम होगी तो सहायक गलियों में पानी ओवरफ्लो होगा और सरकार को घेरने का एक अवसर मिल जाएगा.
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प्रथम दृष्टया ही स्पष्ट है कि यह किसी सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी जो धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, में प्रशासनिक विफलता का झूठा नैरेटिव खड़ा करना था. लेकिन इस मामले में जांच पूरी होने से पहले ही विपक्ष ने सरकार को निशाने पर लेना शुरू कर दिया. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने काशी में जलभराव को लेकर विदेशी पर्यटकों के वीडियो साझा करते हुए सरकार पर हमला बोला. यह जलभराव जानबूझकर सीवर लाइन जाम करने की साजिश का नतीजा था, इस पर सपा अध्यक्ष को न बोलना था और न उन्होंने बोला. लेकिन, महापौर ने सबूतों के साथ पूरी मीडिया के सामने सच्चाई पेश कर दी और प्राथमिकी भी दर्ज कराई. अब सरकार के विरोधी खुद कठघरे में दिखाई दे रहे हैं.
दूसरी घटना भी कम गंभीर नहीं है. यह हाल में संपन्न मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेस कान्फ्रेंस से संबंधित है. इस कान्फ्रेस में सब कुछ सामान्य ढंग से चलता है, फिर यह समाप्त हो जाती है. मुख्यमंत्री पत्रकारों का अभिवादन कर मंच से उठते हैं और प्रस्थान करने लगते हैं. पत्रकारगण भी अपनी सीटों से उठकर चलने लगते हैं. तब वहां पत्रकार के रूप में उपस्थित एक युवती सबको सुनाते हुए जोर से कहती है कि उसके सवाल का जवाब दिया जाए. सवाल क्या है, यह कोई नहीं जानता. कौन पूछ रहा है, उसके बारे में भी लोग नहीं जानते. लेकिन, नाटक यहां खत्म नहीं होता. युवती शोर मचाने के अंदाज में कहती है कि जवाब नहीं देना था तो प्रेस कान्फ्रेंस क्यों बुलाई गई. इसके साथ ही उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कुराहट भी दिखाई देती है. यहां गौर करने की बात यह है कि कुछ ही मिनटों में युवती का यह वीडियो वायरल हो जाता है, और सरकार विरोधियों को मानो एक तैयार नैरेटिव मिल जाता है. किसी ने यह जानने की जहमत नहीं उठाई कि यह युवती किस चैनल से जुड़ी है, उसका अनुभव क्या है, उसकी विश्वसनीयता क्या है. सरकार विरोधी सामग्री परोसने के लिए चर्चित एक यूट्यूब चैनल तत्काल अति-सक्रियता दिखाते हुए इस घटना को लेकर युवती का पूरा साक्षात्कार प्रसारित करने लगता है और ‘अभिव्यक्ति की हत्या’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल शुरू कर देता है.
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सवाल यह उठता है कि यह एक स्वाभाविक घटना थी, या इसे सोच-समझकर अंजाम दिया गया था? ध्यान दीजिए कि युवती बार बार मुख्यमंत्री जी, मुख्यमंत्री जी बोलने पर जोर देती है. लगातार अपने आपको कैमरे के सामने रखती है. कुछ ही मिनटों में यह वीडियो सभी को उपलब्ध हो जाता है. सरकार विरोधी तमाम लोगों को युवती का संपर्क नंबर भी उपलब्ध हो जाता है. यह अपने आप में संदेह पैदा करता है. यह घटनाक्रम किसी स्वाभाविक पत्रकारीय जिज्ञासा से कहीं अधिक, एक तैयार की गई पटकथा जैसा प्रतीत होता है, जिसका मकसद केवल और केवल सरकार को कठघरे में खड़ा करके इसे सोशल मीडिया का मुद्दा बनाना था. यहां पर विपक्ष से जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है, लेकिन समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के एक्स हैंडिल से भी यह वीडियो तीखे कमेंट के साथ प्रसारित किया जाता है. गंभीरता से देखें तो यह पूरा प्रकरण सुनियोजित ढंग से सरकार को निशाने पर लेने के लिये खड़ा किया गया प्रतीत होता है.
ये दोनों घटनाएं अकेली नहीं हैं. बीते कुछ महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जो शुरुआत में बड़े मुद्दे की तरह उछाले गए, ट्रोलबाजों ने बुलबुले की तरह इन्हें हवा दी, लेकिन जांच होते ही ये मुद्दे उतनी ही तेजी से फुस्स हो गए जितनी तेजी से खड़े किए गए थे. यह पैटर्न बताता है कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है, जिसके तहत छोटी-छोटी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. सोशल मीडिया पर मैनुफैक्चर्ड आउटरेज खड़ा किया जाता है, इस उद्देश्य से कि सच्चाई सामने आने से पहले ही लोगों को भ्रमित किया जा सके. पिछले दिनों बाहरी राज्यों के कुछ वीडियोज को यूपी के जर्जर स्कूल बताकर इसी तरह वायरल किया गया था.
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योगी सरकार ने बीते नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश में जो बदलाव लाए हैं, वे किसी से छिपे नहीं हैं. कानून-व्यवस्था में सुधार, माफियाओं पर नकेल, बुनियादी ढांचे का विकास, निवेश में बढ़ोतरी, और महिला सुरक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयास प्रदेश की तस्वीर बदल रहे हैं. ऐसे में जब विपक्ष के पास ठोस नीतिगत मुद्दों की कमी होती है, तो वह इस तरह की मनगढ़ंत या अतिरंजित घटनाओं का सहारा लेकर जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश करता है. यह राजनीति सिर्फ सत्तापक्ष के लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए नुकसानदेह है. विरोध और दुष्प्रचार में फर्क होना चाहिए. सच और झूठ के बीच का विवेक बनाए रखना चाहिए. जब राजनीतिक दल असामाजिक तत्वों की करतूतों को बिना जांचे-परखे अपना राजनीतिक हथियार बना लेते हैं या स्वयं ऐसी साजिशों में शामिल हो जाते हैं, तो यह न केवल लोकतांत्रिक मर्यादाओं का हनन है, बल्कि उनकी अपनी वैचारिक कमजोरी और खोखलेपन का भी प्रमाण है.
सोशल मीडिया के इस युग में सूचनाओं का प्रवाह इतना तेज़ है कि झूठ, सच का चोला पहनकर कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है. ऐसे में जिम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह जल्दबाजी में की गई टिप्पणियों से बचे और तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखे. योगी सरकार पर हुए हालिया हमले इसी गैर-जिम्मेदाराना राजनीति का उदाहरण हैं. प्रदेश में आसन्न विधानसभा चुनाव को देखते पूरी आशंका है कि यह गंदा खेल अभी और गति पकड़ेगा.
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लेखक- अवनीश त्यागी
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई राय सिर्फ़ लेखक की है और यह News24, इसके मैनेजमेंट या इसके स्टाफ़ के विचारों को नहीं दिखाती है।)
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