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पाकिस्तान-अफगानिस्तान में युद्ध के बीच कहां से आ गया दमादम मस्त कलंदर? जानिए दिलचस्प किस्सा

भारत के दो पड़ोसी देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जंग छिड़ चुकी है. दोनों देशों के बीच भयंकर रूप से युद्ध जारी है. इस बी च पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का एक बयान सुर्खियों में है. दोनों देशों के बीच बॉर्डर पर लगातार झड़प और हवाई हमलों के साथ ही बयानबाजी का दौर चल रहा है.

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भारत के दो पड़ोसी देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जंग छिड़ चुकी है. दोनों देशों के बीच भयंकर रूप से युद्ध जारी है. इस बी च पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का एक बयान सुर्खियों में है. दोनों देशों के बीच बॉर्डर पर लगातार झड़प और हवाई हमलों के साथ ही बयानबाजी का दौर चल रहा है.

पाकिस्तान की तरफ से एयरस्ट्राइक की गई और तालिबान राज वाले अफगानिस्तान की तरफ से एक फाइटर जेट को मार गिराने का दावा किया गया. यह तनाव अब युद्ध का रूप लेता जा रहा है. इसी बीच पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने ऐलान करते हुए कहा कि हमारे सब्र का पैमाना भर चुका है. अब हमारे और तुम्हारे बीच खुली जंग होगी. अब ‘दमादम मस्त कलंदर’ होगा. आसिफ ने गोला-बारूद-मिसाइल के बीच सूफी तराना छेड़ दिया है. अब सवाल यह है कि दमादम लड़ाई के हालात के बीच ये मस्त कलंदर कहां से आ गया? ये लाइन अक्सर गाने या कव्वाली के तौर पर सुनाई देती है और ये लाइन्स कहां से आई?ल और इनका मतलब क्या है? आज इस खबर में हम इसी पर चर्चा करेंगे.

दरअसल, दमादम मस्त कलंदर एक आध्यात्मिक सूफी कव्वाली है, जो सिंध के प्रसिद्ध सूफी संत लाल शहबाज कलंदर (1177–1274) के सम्मान में लिखी गई है. उनका दरगाह सेहवान शरीफ में स्थित है. अगर हम दमादम मस्त कलंदर के अर्थ की बात करें तो इसका मतलब होता है- हर सांस कलंदर की मस्ती के नाम यानी कि हर सांस में मस्ती. हालांकि कई इतिहासकारों का यह मानना है कि यह लाइन केवल सूफियाना ना होकर जड़ हो चुके पूरे सिस्टम के खिलाफ विद्रोह की आवाज है.

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कहां से आया दमादम मस्त कलंदर?

वैसे तो दमा दम मस्त कलंदर गाने की शुरुआत का साफ तौर पर पता नहीं है क्योंकि 1950 के दशक से पहले इसके किसी भी लिखित दस्तावेज या ऑडियो रिकॉर्डिंग का प्रमाण नहीं मिलता है. हालांकि लाल शहबाज कलंदर से जुड़ी लोककथाओं के अनुसार यह मूल तराना 13वीं सदी के प्रसिद्ध सूफी कवि अमीर खुसरो ने लिखी थी. बाद में 18वीं सदी में सूफी संत बुल्ले शाह ने इसे नया कलेवर देते हुए प्रसिद्ध कर दिया.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 1973 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो भी उस समय स्थानीय सियासी दौर को लेकर दमादम मस्त कलंदर का प्रयोग किया था. अभी हाल के दौर में 9 साल पहले इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने सेहवान शहर में स्थित सूफी संत लाल शाहबाज कलंदर की दरगाह पर हमला किया, जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे. इसके अगले ही दिन श्रद्धालुओं ने उसी दरगाह में जाकर सूफी गीत और डांस किया था. इसे आतंकियों की करतूत को चुनौती देते हुए खुला विद्रोह करार दिया.

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लेखक के बारे में

Versha Singh

वर्षा स‍िंह News 24 ड‍िजिटल में बतौर सीन‍ियर सब एड‍िटर के पद पर कार्यरत हैं. वर्षा को ड‍िजिटल मीड‍िया में 6 साल से अधि‍क का अनुभव है. राष्‍ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और समसमाय‍िक व‍िषयों पर वर्षा की अच्‍छी पकड़ है. इसके अलावा राजनीत‍िक, क्राइम और ट्रेंडिंग खबरें भी ल‍िखती हैं. वर्षा ने मास्टर इन न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी की पढ़ाई माखन लाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी, भोपाल से की है और जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की है. वर्षा अपने करियर में Jagran New Media, Asia News International (ANI) और ETV Bharat जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं. उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन और समसामयिक घटनाओं, राजनीति, हाइपरलोकल खबरों और मानवीय रुचि से जुड़ी कहानियों को डिजिटल दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अनुभव है.
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