अंतरिक्ष की दुनिया में 2 स्पेस स्टेशन हैं, एक नासा का जो 15 देशों ने मिलकर बनाया है और दूसरा 2021 में स्थापित चीन का तियांगोंग स्पेस स्टेशन है. इनमें से नासा का इंटरनेशनल अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) साल 2030 तक खत्म हो जाएगा, यानी वर्किंग से बाहर हो जाएगा. भारत ने भी अपना स्पेस स्टेशन स्थापित करने की तैयारी शुरू कर दी है. भारत सरकार ने इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO) के साथ मिलकर साल 2035 तक भारतीय स्पेस स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इसके लिए पहले मॉड्यूल को मंजूरी मिल चुकी है. यह जानकारी इसरो चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन ने देशवासियों को दी है. अगर भारत अपना स्पेस स्टेशन स्थापित कर लेता है तो वह चीन के बाद ऐसा करने वाला दूसरा देश होगा.
भारतीय स्पेस स्टेशन कितना बड़ा होगा?
अंतरिक्ष में भारत के स्पेस स्टेशन को भारतीय स्पेस स्टेशन कहा जाएगा. पहले स्पेस स्टेशन स्थापित करने की डेडलाइन 2030 तक रखी गई थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 2035 कर दिया गया है. भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन पृथ्वी की कक्षा में 400 किलोमीटर ऊपर स्थापित किया जाएगा. इसका वजन 52 टन, लंबाई 27 मीटर और चौड़ाई 20 मीटर होगी. भारतीय स्पेस स्टेशन के अंदर 5 मॉड्यूल होंगे, जिसे 3 से 4 अंतरिक्ष यात्रियों के लिए डिजाइन किया गया है. लेकिन जरूरत पड़ने में इसमें 5-6 अंतरिक्ष यात्री आराम से रह सकेंगे. वहीं भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन में अंतरिक्ष यात्री 3 से 6 महीने तक आराम से रह सकेंगे. पहले मॉड्यूल को सितंबर 2024 में मंजूरी मिल गई थी, जिसके लिए केंद्र सरकार ने 1763 करोड़ का बजट अलॉट किया है.
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इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन कब खत्म होगा?
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) साल 2030 के आखिर तक सर्विस से बाहर हो जाएगा और साल 2031 की शुरुआत में इसे धरती पर गिराकर समाप्त कर दिया जाएगा. साल 2028 में स्पेस स्टेशन को इसके ऑर्बिट को बनाए रखने की प्रक्रिया बंद करने की शुरुआत होगी और साल 2030 तक प्रक्रिया पूरी तरह बंद कर दी जाएगी. वर्किंग बंद होने के बाद स्पेस स्टेशन को स्पेशल स्पेसक्राफ्ट के जरिए पृथ्वी के वायुमंडल में लाया जाएगा और इस दौरान इसका ज्यादातर हिस्सा जलकर राख हो जाएगा. बचे हुए मलबे को प्रशांत महासागर में पॉइंट नीमो पर गिराने की योजना है. इस पूरी प्रक्रिया में 9500 करोड़ रुपये ($1 अरब डॉलर) खर्च होने का अनुमान है. अंतरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) को 5 स्पेस एजेंसियों और 15 देशों ने बनाया है.
स्पेस स्टेशन होता क्या और कैसा होता है?
स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में तैरती हुई बेलनाकार डिब्बों (मॉड्यूल) वाली हाई-टेक साइंटिफिक लैब होती है, जिसके अंदर अंतरिक्ष वैज्ञानिक रिसर्च करते हैं. स्पेस स्टेशन के दोनों तरफ विशाल चमकीले सोलर पैनल लगे होते हैं, जो सूरज की रोशनी से बिजली बनाते हैं, जिससे स्पेस स्टेशन काम करता है. नासा का इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन 356 फीट लंबा है और 4.20 लाख किलो वजनी है. इसके अंदर बिजली के लिए 13 किलोमीटर लंबी वायरिंग है और इससे एक बार में 8 अंतरिक्ष यान जुड़ सकते हैं. पृथ्वी से 402 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्पेस स्टेशन स्थित है और यह पृथ्वी की 90% आबादी के ऊपर से गुजरते हुए लगातार धरती का चक्कर लगता रहता है. शाम को या सुबह के समय इस स्पेस स्टेशन को बिना किसी उपकरण के देखा जा सकता है.
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इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में कितने मॉड्यूल्स?
स्पेस स्टेशन एक नहीं, बल्कि कई मॉड्यूल्स का ग्रुप होता है. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में 16 मॉड्यूल्स हैं. इस पूरे स्पेस स्टेशन को बनाने में 13 साल लगे. पहला मॉड्यूल 20 नवंबर 1998 को लॉन्च हुआ था. इसके अंदर पहला क्रू 2 नवंबर 2000 को पहुंचा था. साल 2011 में इस स्पेस स्टेशन से आखिरी और 16वां मॉड्यूल जोड़ा गया था. आज तक यह स्पेस स्टेशन कभी खाली नहीं रहा, इसके अंदर हमेशा अंतरिक्ष यात्री होते हैं. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन 6 बेडरूम वाले घर से कहीं ज्यादा बड़ा है, जिसमें 6 स्लीपिंग क्वार्टर, 2 बाथरूम, एक जिम और एक खिड़की है. एक समय में 6 और ज्यादा से ज्यादा 11 अंतरिक्ष यात्री इसके अंदर रह सकते हैं. इसके अंदर करीब 4 साइंटिफिक लैब हैं और इसे बनाने में करीब 150 अरब डॉलर का खर्च आया है.
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन कभी स्थिर नहीं रहा, बल्कि पिछले 25 सालों से 28000 किलोमीटर प्रति घंटा लगातार पृथ्वी के चक्कर काट रहा है. 90 मिनट में यह स्टेशन पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है. 24 घंटे में 16 बार सूरज को उगते हुए और 16 बार डूबते हुए देखता हैं. 45 मिनट का दिन और 45 मिनट की रात होती है. इसलिए इसके अंदरअंतरिक्ष यात्री को-ऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम (UTC) से तालमेल बिठाकर खुद को एडजस्ट करते हैं. धरती जैसे माहौल के लिए इसमें LED लाइट्स लगाई जाती हैं.
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