देश-दुनिया में मशहूर एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक 28 जून से दिल्ली में जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे थे, जिससे उनकी जान को खतरा पैदा हो गया था. सोनम की हालत बिगड़ते देख दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर पुलिस उन्हें जबरन उठाकर अस्पताल ले गई. ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर भूख हड़ताल के दौरान सोनम वांगचुक की मौत हो जाती तो क्या होता है? क्या पुलिस कार्रवाई होती है? क्या किसी पर केस दर्ज होता है? क्या मृतक के परिजनों को मुआवजा मिलता है?

क्या मौत के लिए सरकार या कोई शख्स जिम्मेदार होगा?

नहीं, भूख हड़ताल कर रहे शख्स की मौत के लिए कोई और शख्स या सरकार जिम्मेदार नहीं है. क्योंकि भूख हड़ताल करने का फैसला शख्स का व्यक्तिगत फैसला होता है. भूख हड़ताल के लिए उसे किसी ने मजबूर नहीं किया है. भारत लोकतांत्रिक देश है, इसलिए देशवासियों को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है और विरोधस्वरूप भूख हड़ताल करके अपनी जिंदगी को खतरे में डालने के लिए प्रदर्शनकारी खुद कानूनी रूप से जिम्मेदार होगा. किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

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भूख हड़ताल करने पर तबियत बिगड़े तो क्या अधिकार?

भारत में पहले भूख हड़ताल करने वाले शख्स को तबियत बिगड़ने पर जेल में डाल दिया जाता था. उनके खिलाफ सुसाइड का केस दर्ज किया जाता था, जैसे शर्मिला इरोम के साथ किया गया था. लेकिन अब कानून बदल गए हैं और संशोधित नियमों के अनुसार, अगर भूख हड़ताल कर रहा शख्स बीमार पड़ जाए तो सरकार को अधिकार है कि वह उस शख्स को जबरन अस्पताल में भर्ती करा सकती है और अपनी सुरक्षा में इलाज कराकर उसकी देखभाल करके उसे स्वस्थ कर सकती है.

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जिला-राज्य प्रशासन और कोर्ट को दखल का अधिकार

बता दें कि भारतीय कानून के अनुसार, भूख हड़ताल से मौत होने पर बेशक सीधे केस किसी पर दर्ज नहीं किया जा सकता. लेकिन अदलातों का कहना है कि देश के हर नागरिक के जीवन की रक्षा करना पहली और संवैधानिक जिम्मेदारी है. अगर कोई श्ख्स राज्य में भूख हड़ताल पर बैठा है या पब्लिक प्लेस पर अनशन किया जा रहा है तो प्रशासन को अनशनकारी का मेडिकल कराकर उस पर नजर रखने का अधिकार होता है. अगर मामले में लापरवाही बरती या समय पर मेडिकल ट्रीटमेंट न मिले तो मानवाधिकार आयोग या कोर्ट के जरिए सरकार जिला प्रशासन की जवाबदेही तय कर सकती है.

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भूख हड़ताल के लिए उकसाने पर हो सकती कार्रवाई?

बता दें कि देश के संविधान में कानून के तहत प्रावधान है कि अगर कोई भूख हड़ताल करने के लिए उकसाता है या मेडिकल ट्रीटमेंट देने-लेने से रोकता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है. आपराधिक षडयंत्र रचने या आत्महत्या के लिए उकसाने की धाराओं के तहत उकसाने वाले के खिलाफ केस चलाया जा सकता है.

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मुआवजा को लेकर संविधान में क्या हैं प्रावधान?

भारतीय कानून के तहत भूख हड़ताल से मौत पर मुआवजा देने का प्रावधान नहीं है और न ही मुआवजे के लिए बाध्य किया जा सकता है. लेकिन खास मामलों में मानवीय आधार पर केंद्रीय और सरकारें मृतक के परिजनों को आर्थिक मदद दे सकती है. मुख्यमंत्री राहत कोष या फिर प्रधानमंत्री राहत कोष जैसे फंड से मुआवजा दिया जा सकता है. वहीं अगर प्रदर्शनकारियों के साथ समझौता हो जाए तो सरकार आर्थिक मदद के तौर पर मुआवजा, परिवार के किसी सदस्य को नौकरी या दूसरी सहायता दे सकती है. लेकिन इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.

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