सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित एक हत्या मामले की अपील पर फैसला आने में चार दशक से ज्यादा समय लगने पर गहरी नाराजगी जताई है. अदालत ने इस मामले को भारतीय न्याय व्यवस्था में बढ़ते लंबित मामलों की गंभीर समस्या का उदाहरण बताते हुए इसके समाधान के लिए सुझाव और ठोस एक्शन की मांग की है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने कहा कि किसी व्यक्ति को न्याय पाने के लिए 40 साल तक इंतजार करना बेहद चिंताजनक है. अदालत ने सवाल उठाया कि अगर अपीलों का निपटारा इतनी लंबे वक्त तक नहीं हो पाता है तो इसका सीधा असर न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है.

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क्या है पूरा मामला?

मामला एक हत्या के केस से जुड़ा है जिसमें आरोपी को साल 1983 में गिरफ्तार किया गया था. विजय सिंह नामक शख्स को नवंबर 1983 में अपने भाई की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, उस समय उनकी उम्र 28 साल थी. कानपुर की एक सेशंस कोर्ट ने दिसंबर 1985 में विजय सिंह को हत्या का दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई. सिंह ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी. हालांकि, उनकी अपील लगभग 41 साल तक लंबित रही और आखिरकार 9 फरवरी 2026 को हाई कोर्ट ने 20 पन्नों के फैसले के जरिए इसे खारिज कर दिया. सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि सिंह ने हिरासत में सिर्फ तीन महीने बिताए थे और अपनी अपील के नतीजे का इंतजार करते हुए लगभग 43 साल तक जमानत पर रहे थे. कोर्ट ने कार्यवाही चलने के दौरान उसकी जमानत जारी रखने का फैसला किया.

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में मामलों के निपटारे में होने वाली लंबी देरी की समस्या पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि ज्यादा पेंडेंसी की वजह से मुकदमेबाज अक्सर जल्द सुनवाई के निर्देश पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं. जस्टिस मिश्रा ने सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे और एडवोकेट जोहेब हुसैन से पुराने मामलों के निपटारे में तेजी लाने के संभावित उपायों पर सुझाव मांगे. मिस्टर दवे ने सुझाव दिया कि तीन दशकों से ज्यादा समय से लंबित प्रॉसिक्यूशन अपीलों को खारिज करके बैकलॉग को कम किया जा सकता है. हालांकि, बेंच ने इस विचार को खारिज कर दिया और कहा कि न्याय करने के बुनियादी सिद्धांत सिर्फ लंबे समय से लंबित मामलों को खारिज करने की इजाजत नहीं देते हैं. बेंच ने चेतावनी दी कि इस तरह के रवैये से जनहित पर बुरा असर पड़ सकता है और पक्षों को अपना पक्ष रखने के मौके से वंचित किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट में अपनी अपील में, सिंह ने मामले में हुई लंबी देरी का जिक्र करते हुए कहा कि वो अब 72 साल के हो चुके हैं और उन्होंने अपनी जवानी, अधेड़ उम्र और बुढ़ापा एक क्रिमिनल के तौर पर बिताया है.

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