देश की राजधानी दिल्ली में ऐतिहासिक प्रदर्शन स्थल ‘जंतर-मंतर’ को लेकर कानूनी घमासान तेज हो गया है. सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर को धरना स्थल की सूची से हटाने (डी-नोटिफाई करने) के दिल्ली पुलिस के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. साथ ही, केंद्र और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने गुरुवार को यह नोटिस जारी किया. सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत केंद्र सरकार का पक्ष जानना चाहती है और जवाब आने के बाद यदि कोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ तो नियमानुसार कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी. वहीं, CJI सूर्यकांत ने कहा, “हमने पूरा होमवर्क किया है और मामले के सभी बिंदुओं को अच्छी तरह समझते हैं. यह विचार करने योग्य विषय है, इसीलिए नोटिस जारी किया गया है.”
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल से हटाने का फैसला एक उच्चस्तरीय कमेटी की सिफारिश पर लिया गया है. गृह मंत्रालय की गाइडलाइंस के मुताबिक, नागरिकों के विरोध प्रदर्शन के अधिकार को ध्यान में रखते हुए किसी बेहतर वैकल्पिक जगह की तलाश के लिए यह कमेटी बनाई गई थी.
जंतर-मंतर को हटाने पर क्यों उठा विवाद?
दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल से डी-नोटिफाई करने के फैसले के बाद से लगातार विरोध दर्ज कराया जा रहा है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जंतर-मंतर दशकों से लोकतांत्रिक विरोध और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का मुख्य केंद्र रहा है. इसे अचानक हटाना आम नागरिकों के शांतिपूर्ण सभा और विरोध प्रदर्शन के मौलिक अधिकार पर असर डालता है.
गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस द्वारा 11 अक्टूबर को जंतर मंतर को धरना प्रदर्शन स्थलों की लिस्ट से हटा दिया था, जिसके बाद आंदोलनकारियों को प्रदर्शन के लिए तीन नई जगह निर्धारित कई गई थी. अब इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया था. साथ ही शीर्ष अदालत ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुए प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं के बैच पर सुनवाई शुरू कर दी है.
10 अक्टूबर के प्रदर्शन को लेकर भी कड़ा रुख
अदालत के सामने 10 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिसिया कार्रवाई का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा. याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि उस दिन शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे लोगों, मौके पर मौजूद वकीलों और रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को बेवजह हिरासत में लिया गया. सुप्रीम कोर्ट अब इस पूरे मामले की वैधानिकता और प्रशासन के कदमों की गहन समीक्षा कर रहा है. मामले की अगली सुनवाई पर अदालत सरकार और पुलिस के जवाब का आकलन करेगी.