आपने देखा होगा कि कई सोशल मीडिया अकाउंट्स आरोपियों की आपत्तिजनक स्थितियों की फोटो और वीडियो पोस्ट करते हैं। इसमें आरोपी हथकड़ी पहने, रस्सियों से बंधे, पीटे गए, घुटनों के बल बैठने को मजबूर किए गए या घसीटे गए दिखाए जाते हैं। ऐसे कंटेट पोस्ट करने वाले कई बार आम क्रिएटर भी होते हैं तो कई बार छोटे कथित न्यूज चैनल। अब सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कंटेट पर नाराजगी जताई है।
सोशल मीडिया का दौर है। ऐसे में हर छोटी सी छोटी चीज सोशल मीडिया पर पहुंच जाती है। कारण सिर्फ अपनी रीच यानी लोगों को अपने अकाउंट तक लाने की कोशिश, किसी भी प्रकार का कंटेंट अपलोड करके सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की रेस में शामिल होना, सोशल मीडिया से कमाई के लिए बिना फिल्टर कंटेट परोसना।
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दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और असम सहित राज्यों में पुलिस अधिकारियों के आचरण पर चिंता जताने वाली एक जनहित याचिका पर 20 मार्च को सुनवाई हो रही थी। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की है कि सोशल मीडिया पर कुछ संस्थाएं मीडियाकर्मी होने का भेष बदलकर ब्लैकमेलर के रूप में काम कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट का इशारा मुख्य रूप से सोशल मीडिया पर चल रहे कथित मीडिया चैनलों की तरफ था।
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सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह "डिजिटल अरेस्ट" का एक वैकल्पिक रूप है। सीजेआई ने टिप्पणी की है कि यह डिजिटल अरेस्ट का एक और प्रारूप है। दुर्भाग्य से, इसे अभी भी अपराध नहीं माना जा रहा है।
दायर याचिका में आधिकारिक इंस्टाग्राम हैंडल पर आरोपी व्यक्तियों की आपत्तिजनक स्थितियों (जैसे हथकड़ी पहने, रस्सियों से बंधे, पीटे गए, घुटनों के बल बैठने को मजबूर किए गए या घसीटे गए) में तस्वीरें और लघु वीडियो अपलोड करने की प्रथा को उजागर किया गया, जिससे उनके अधिकारों का संभावित उल्लंघन हो रहा था।
सुनवाई के दौरान, पीठ ने याचिकाकर्ताओं को एक संबंधित मामले में अनुपालन के परिणाम की प्रतीक्षा करने को कहा, जिसमें सभी राज्य पुलिस बलों को आरोपी व्यक्तियों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाली सामग्री के प्रकाशन पर रोक लगाने वाले दिशानिर्देशों वाली नियमावली को लागू करने के निर्देश पहले ही जारी किए जा चुके थे।
साथ ही, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को विभिन्न राज्य पुलिस अधिकारियों द्वारा न्यायालय के पूर्व निर्देशों के अनुपालन की सीमा के संबंध में अद्यतन विवरण प्रस्तुत करते हुए एक नई, व्यापक याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी।
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