जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के शुरुआती दौर के एक सबसे खौफनाक और काले अध्याय में आखिरकार न्याय की उम्मीद जागी है. कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट के अपहरण, यौन उत्पीड़न और बेरहमी से की गई हत्या के 36 साल बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस की विशेष विंग, स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने सोमवार को श्रीनगर की विशेष टाडा कोर्ट में एक विस्तृत चार्जशीट दाखिल कर दी है. इस 737 पन्नों की चार्जशीट में प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के प्रमुख मोहम्मद यासीन मलिक को मुख्य साजिशकर्ता के रूप में नामजद किया गया है.
सोची-समझी साजिश थी – SIA
SIA की जांच में यह साफ तौर पर स्थापित हुआ है कि सरला भट्ट की हत्या कोई इकलौती या अचानक हुई हिंसक घटना नहीं थी. यह जेकेएलएफ के शीर्ष कमांड और नियंत्रण के तहत रची गई एक बहुत बड़ी आतंकी साजिश का हिस्सा थी. इस साजिश का मुख्य मकसद घाटी में अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडित समुदाय के बीच खौफ पैदा करना और उन्हें वहां से व्यवस्थित तरीके से जबरन पलायन करने के लिए मजबूर करना था.
क्या था पूरा मामला?
27 वर्षीय सरला भट्ट अनंतनाग जिले की रहने वाली थीं और श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) में स्टाफ नर्स के रूप में काम कर रही थीं. घाटी में बढ़ते आतंक और धमकियों के बावजूद वे अपनी ड्यूटी पर जा रही थीं. 15 अप्रैल 1990 को जेकेएलएफ के आतंकियों ने उनके हॉस्टल के पास से उनका अपहरण कर लिया था.
बंधक बनाए जाने के दौरान उन्हें भयानक शारीरिक यातनाएं दी गईं और उनका यौन उत्पीड़न किया गया. इसके बाद श्रीनगर के ओमर कॉलोनी में ऑटोमैटिक राइफल से अंधाधुंध गोलियां मारकर उनकी हत्या कर दी गई. आतंकियों ने उनके शव के पास जेकेएलएफ का एक नोट भी छोड़ा था, जिसमें उन पर सुरक्षा बलों के लिए ‘मुखबिर’ होने का झूठा आरोप लगाया गया था. हालांकि, SIA ने साफ किया है कि मुखबिर होने का आरोप पूरी तरह से मनगढ़ंत और उनकी पूर्व-नियोजित हत्या को सही ठहराने का एक बहाना मात्र था.
SIA ने इस मामले में पांच आतंकियों को आरोपी बनाया है. मोहम्मद यासीन मलिक, उस समय जेकेएलएफ का ‘चीफ कमांडर’ था. वह फिलहाल दिल्ली की तिहाड़ जेल में टेरर फंडिंग के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है. खुर्शीद अहमद चाल्को मुख्य शूटर था जिसने सरला पर गोली चलाई थी. वह फिलहाल फरार है और माना जा रहा है कि वह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर भाग गया है. अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सोफी उर्फ इदरीस, और गुलाम मोहम्मद तापलू, इन तीनों अन्य सह-आरोपियों की मौत हो चुकी है.
36 साल क्यों लगे?
आतंकवाद के दौर में गवाहों को डराने-धमकाने और खौफ के माहौल के कारण दशकों तक यह मामला ठंडे बस्ते में रहा. मार्च 2024 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन डीजीपी ने इस पुराने केस को वैज्ञानिक और नए सिरे से जांच के लिए SIA को ट्रांसफर किया था. पिछले दो वर्षों में, SIA ने श्रीनगर में कई ठिकानों पर छापेमारी की. एजेंसी ने दशकों पुराने मौखिक, दस्तावेजी, फोरेंसिक, बैलिस्टिक, मेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को इकट्ठा कर उनका बारीकी से विश्लेषण किया.
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस घटनाक्रम को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक ऐतिहासिक बताया है.
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