संसद के भीतर विपक्ष का साझा विरोध लगातार दिखाई दे रहा है. लेकिन उसके मुद्दे अब अलग-अलग नजर आने लगे हैं. यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ संसद की रणनीति का नहीं, बल्कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के भविष्य का भी उठने लगा है.

लोकसभा और संसद परिसर में पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस कई अहम मुद्दों पर एक सुर में नहीं हैं. दोनों दल सरकार के खिलाफ विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन उनके राजनीतिक एजेंडे अलग दिखाई दे रहे हैं.
हालिया घटनाक्रम में कांग्रेस जहां सीजेपी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित बर्बरता के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी ने साफ किया कि वह फिलहाल गृह मंत्री का इस्तीफा नहीं मांग रही. सपा नेताओं का कहना है कि उनका मुख्य मुद्दा 'चंदा चोरी' है.

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इसी क्रम में सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव ने निर्दलीय सांसद पप्पू यादव के राम मंदिर चंदा को लेकर किए गए विरोध प्रदर्शन से भी दूरी बना ली. रामगोपाल यादव ने कहा कि संतों का चोरी से कोई लेना-देना नहीं है और पप्पू यादव के इस तरह के प्रदर्शन का सपा समर्थन नहीं करती. जबकि इससे पहले संसद परिसर में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान सपा अन्य विपक्षी दलों के साथ मौजूद थी.

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लोकसभा में भी न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने वाले विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने हंगामा किया, लेकिन जब सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क से बातचीत हुई तो उन्होंने भी कहा कि उनकी पार्टी फिलहाल गृह मंत्री का इस्तीफा नहीं मांग रही और उनका मुद्दा अलग है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 'चंदा चोरी' का मुद्दा उठाना संत समाज का विरोध नहीं है।

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यूपी चुनाव की रणनीति या वैचारिक दूरी?

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं. सपा जहां अपने पारंपरिक सामाजिक समीकरण और मुस्लिम-ओबीसी वोट बैंक को साधने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस अपनी अलग राजनीतिक पहचान मजबूत करने का प्रयास कर रही है. ऐसे में दोनों दल संसद में सरकार के खिलाफ एकजुट दिखना चाहते हैं, लेकिन ऐसे मुद्दों से बचते भी नजर आते हैं जिनका यूपी की राजनीति में अलग असर पड़ सकता है.

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बीजेपी भी इसी अंतर को राजनीतिक मुद्दा बनाने में जुट गई है. आगरा से बीजेपी सांसद एसपी सिंह बघेल ने दावा किया कि सपा का रुख बदलना उसकी राजनीतिक मजबूरी है क्योंकि उत्तर प्रदेश चुनाव सामने हैं. उनका कहना है कि सपा सनातन से जुड़े मुद्दों पर खुलकर कांग्रेस के साथ नहीं खड़ी हो सकती.

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इंडिया गठबंधन पर उठते सवाल

पिछले कुछ महीनों में संसद के भीतर कई ऐसे मौके आए हैं, जब विपक्षी दलों का प्रदर्शन साझा रहा, लेकिन उनके पोस्टर, नारे और प्राथमिकताएं अलग-अलग रहीं. इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या इंडिया गठबंधन की एकजुटता केवल संसद तक सीमित है या चुनावी राजनीति में भी कायम रहेगी.

अब तक उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच औपचारिक सीट साझेदारी या गठबंधन पर कोई सार्वजनिक चर्चा सामने नहीं आई है. ऐसे में यदि दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं, तो इसका सीधा राजनीतिक फायदा बीजेपी को मिल सकता है. वहीं यदि गठबंधन होता है, तो सीट बंटवारे और नेतृत्व जैसे मुद्दे बड़ी चुनौती बन सकते हैं.

फिलहाल संसद की तस्वीर यही संकेत दे रही है कि विरोध एक है, लेकिन विपक्ष के मुद्दे अलग-अलग हैं. यही अंतर आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण संकेत बन सकता है.