प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने भारत से जमीन की सीमा साझा करने वाले देशों—जिसमें चीन भी शामिल है—से आने वाले निवेश के नियमों में बदलाव को मंजूरी दी है. नए फैसले के तहत ऐसे निवेशकों की 10 प्रतिशत तक की नॉन-कंट्रोलिंग हिस्सेदारी को अब सेक्टोरल शर्तों के साथ ऑटोमैटिक रूट के तहत अनुमति दी जाएगी.

सरकार ने बेनिफिशियल ओनर की परिभाषा को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम नियम, 2005 के मानकों के अनुरूप तय किया है और इसकी जांच निवेशक इकाई के स्तर पर की जाएगी. निवेश प्राप्त करने वाली कंपनियों को इस संबंध में जानकारी उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) को देनी होगी.

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कैबिनेट ने यह भी तय किया है कि कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, पॉलीसिलिकॉन और इन्गॉट-वेफर जैसे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आने वाले निवेश प्रस्तावों को 60 दिनों के भीतर मंजूरी दी जाएगी. हालांकि इन कंपनियों में बहुमत नियंत्रण भारतीय नागरिकों या भारतीय संस्थाओं के पास ही रहेगा.

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कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार ने सीमा से लगे देशों से आने वाले निवेश को सरकारी मंजूरी के दायरे में ला दिया था, ताकि भारतीय कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहण को रोका जा सके.

इससे विदेशी निवेश बढ़ेगा – कई वैश्विक फंड्स में चीनी या अन्य पड़ोसी देशों के निवेशकों की छोटी हिस्सेदारी होती है. 10% तक ऑटोमैटिक रूट मिलने से ऐसे निवेश भारत में आसानी से आ सकेंगे. इलेक्ट्रॉनिक्स और कैपिटल गुड्स जैसे क्षेत्रों में पूंजी और तकनीक आएगी, जिससे घरेलू उत्पादन बढ़ेगा.

पहले छोटी हिस्सेदारी होने पर भी सरकारी मंजूरी की जरूरत पड़ती थी, जिससे निवेश में देरी होती थी. अब प्रक्रिया तेज होगी. सरकार ने यह शर्त रखी है कि कंपनियों का नियंत्रण भारतीय हाथों में ही रहेगा, जिससे रणनीतिक क्षेत्रों में नियंत्रण बाहर नहीं जाएगा.