कोख में पल रहे बच्चे को लेकर ऐतिहासिक फैसला दिया गया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि गर्भ में बच्चे को रखने या गिराने का फैसला लेने का अधिकार किसका है? मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर अहम फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गर्भ में बच्चे को रखना है या गर्भपात कराना है, यह फैसला लेने करने का अधिकार सिर्फ महिला का है। इसके लिए उसे पति की सहमति लेने की आवश्यकता नहीं है।
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पति से अलग रह रही याचिकाकर्ता
इंदौर बेंच ने 13 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) ऐक्ट के तहत गर्भपात कराने की परमिशन दे दी। 29 जून 2026 को बेंच ने फैसला सुनाकर केस का निपटारा किया था। मामला अलग-अलग रह रहे पति-पत्नी का है। 2 साल पहले शादी हुई थी, लेकिन विवादों के कारण दोनों मर्जी से अलग हो गए। इस बीच महिला गर्भवती हो गई तो उसने कोर्ट से गर्भपात की परमिशन मांगी। जीपी सिंह वकील के जरिए उसने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
पति अदालत में पेश ही नही हुआ
याचिका में महिला ने दलील दी कि वैवाहिक संबंध टूटने वे वह मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से कमजोर है। ऐसे में बच्चे का जन्म मुश्किल हो जाएगा। भविष्य में उसके पालन-पोषण में भी समस्या आ सकती है, इसलिए उसने गर्भपात कराने का फैसला किया है और इसके लिए नियमानुसार कोर्ट की परिमशन चाहिए। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पति को समन भेजा लेकिन वह किसी अदालत में पेश नहीं हुआ। राज्य सरकार ने भी याचिका पर किसी तरह का विरोध नहीं किया।
बेंच ने अनुच्छेद 21 का जिक्र किया
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘एक्स बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर’ का हवाला देते हुए महिला को गर्भ गिराने की अनुमति दे दी। फैसले के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रत्येक महिला को अपने शरीर और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने की स्वतंत्रता है। यह उसकी व्यक्तिगत गरिमा और मौलिक अधिकार का हिस्सा है। अवांछित गर्भावस्था से महिला पर मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसलिए उसे गर्भ रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।
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अस्पताल को दिए गर्भपात के निर्देश
बेंच ने फैसले में स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के संबंध बिगड़ चुके हों और दोनों अलग रह रहे हों या तलाक की स्थिति हो तो इस परिस्थिति में महिला यदि गर्भ जारी नहीं रखना चाहती है तो उसकी इच्छा गर्भपात की अनुमति देने के लिए वैध और न्यायसंगत आधार है। गर्भपात की पूरी प्रक्रिया स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा कोर्ट के द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार पूरी की जाएगी। महिला की गोपनीयता, गरिमा और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए और चिकित्सकीय सावधानी बरती जाए।
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