कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नाम से दिल्ली में किए गए प्रदर्शनों से संबंधित मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन से जुड़े किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक जांच शुरू करने के लिए FIR दर्ज कराने का आदेश देने का अधिकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास है. किसी समिति या अन्य संस्था को इस संबंध में अपनी तरफ से निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं है. मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इसी संदर्भ में अपनी ‘लक्ष्मण रेखा’ स्पष्ट की.
SC ने किया 5 सदस्यीय कमेटी का गठन
दरअसल, इस पूरे मामले की पड़ताल के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड एनक्वायरी कमेटी (HPEC) का गठन किया है. सुनवाई के दौरान अदालत ने समिति की भूमिका और उसकी शक्तियों को लेकर स्थिति साफ कर दी है. कोर्ट ने कहा कि HPEC को मामले से जुड़े आरोपों की जांच करने, प्रभावित या पीड़ित लोगों की पहचान करने और जांच के आधार पर अपनी सिफारिशें अदालत के सामने रखने का अधिकार है.
हालांकि, समिति अपनी ओर से किसी आपराधिक जांच को आगे बढ़ाने के लिए FIR दर्ज करने का निर्देश नहीं दे सकती. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि इस तरह का आदेश जारी करने का अधिकार न्यायालय के पास ही सुरक्षित है. इस तरह अदालत ने जांच समिति के कामकाज की सीमा तय करते हुए उसके अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट कर दिया है.
FIR को लेकर क्या है पूरा विवाद?
दिल्ली पुलिस की ओर से CJP आंदोलन से जुड़े 13 FIR को वापस लेने और प्रदर्शन के दौरान मौजूद लोगों की भूमिका की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. पुलिस ने यह भी कहा था कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद 2,873 लोगों की आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच की जरूरत है, ताकि हिंसा या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं में उनकी भूमिका का पता लगाया जा सके.
अदालत ने पहले स्पष्ट किया था कि प्रदर्शनकारियों को दी गई राहत का अर्थ यह नहीं है कि गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल लोगों को भी स्वत: संरक्षण मिल जाएगा. हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के मामलों को अलग नजर से देखने की बात सामने आई थी.
1 सितंबर के आदेश में क्या कहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शनों से संबंधित आपराधिक मामलों पर बड़ा आदेश दिया था. अदालत ने निर्देश दिया था कि 20 से 25 जुलाई के दौरान हुए प्रदर्शनों को लेकर दर्ज FIR में आगे किसी तरह की जांच या कार्रवाई नहीं की जाएगी और इन मामलों को बंद माना जाएगा. शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि इन घटनाओं के सिलसिले में अब नई FIR दर्ज नहीं की जानी चाहिए.
अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा- SC
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह साफ किया कि न्यायिक आदेश की सीमा और उसकी व्याख्या को लेकर कोई अन्य संस्था अपनी तरफ से फैसला नहीं कर सकती. अदालत का कहना था कि FIR से जुड़े मामलों में अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अपनी अधिकार सीमा को स्पष्ट करते हुए किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के लिए सीमा तय कर दी है.
CJP आंदोलन की शुरुआत NEET परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर हुई थी. जुलाई में आंदोलन खत्म होने के बाद भी FIR, पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया को लेकर विवाद बना हुआ है.
इस बीच अदालत ने प्रदर्शन में शामिल एक नाबालिग लड़की को कथित धमकी और उत्पीड़न के मामले में भी गंभीरता दिखाई है. सुप्रीम कोर्ट ने उसके और उसके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं.
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पुलिस कार्रवाई और हिंसा के आरोपों की पड़ताल करेगी कमेटी
20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन से जुड़े विभिन्न आरोपों की स्वतंत्र जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड एनक्वायरी कमेटी (HPEC) का गठन किया है. इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं. समिति को प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा बल इस्तेमाल किए जाने के आरोपों की जांच करनी है. इसके अलावा सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़े आरोप भी जांच के दायरे में हैं.
जांच के दौरान कमेटी दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों के साथ लोगों की ओर से दिए गए प्रतिवेदन पर भी विचार कर सकती है. गवाहों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए समिति को गुमनाम शिकायतें स्वीकार करने की भी अनुमति दी गई है. इससे ऐसे लोग भी अपनी बात सामने रख सकेंगे, जिन्हें अपनी पहचान उजागर होने पर किसी तरह का खतरा महसूस होता है.
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