आधुनिक युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा में मिसाइलों की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है. ये केवल हमला करने का एक हथियार नहीं हैं, बल्कि किसी भी देश की रक्षा क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक अत्याधुनिक मिसाइल को तैयार करने में कितनी रकम खर्च होती है और दुनिया की सबसे महंगी मिसाइल कौन-सी है और उसकी कीमत कितनी है?
मिसाइलें किसी भी देश की सैन्य क्षमता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं. लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की क्षमता, अत्याधुनिक तकनीक और उच्च स्तर की सुरक्षा व्यवस्था के कारण इनकी लागत भी बहुत ज्यादा अधिक होती है. यही वजह है कि एक मिसाइल की कीमत लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों और कई मामलों में अरबों रुपये तक पहुंच जाती है. इसकी वास्तविक लागत इस बात पर निर्भर करती है कि वह मिसाइल किस उद्देश्य के लिए विकसित की गई है, उसकी मारक क्षमता कितनी है और उसमें किस स्तर की तकनीक का उपयोग किया गया है.
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रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, किसी मिसाइल की कीमत केवल उसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले धातु या ईंधन से तय नहीं की जाती है. इसके पीछे सालों की रिसर्च, परीक्षण, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, मार्गदर्शन प्रणाली, सेंसर, रडार तकनीक, प्रोपल्शन सिस्टम और उत्पादन प्रक्रिया जैसी कई महंगी तकनीकी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं. यही कारण है कि आधुनिक मिसाइलों के विकास पर रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा खर्च किया जाता है.
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कौन सी मिसाइल है दुनिया की सबसे महंगी मिसाइल?
दुनिया की सबसे महंगी मिसाइलों में अमेरिका की Trident II (D5) बैलिस्टिक मिसाइल का नाम शामिल है. यह पनडुब्बियों से दागी जाने वाली अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) है, जिसकी एक इकाई की अनुमानित कीमत करीब 70 से 80 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 600 से 700 करोड़ रुपये या उससे अधिक, विनिमय दर के अनुसार) बताई जाती है. इसकी लंबी मारक क्षमता, अत्यधिक सटीकता और परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता इसे दुनिया की सबसे उन्नत और महंगी मिसाइलों में से एक बनाती है.
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इसके अलावा अमेरिका की Tomahawk क्रूज मिसाइल, Patriot PAC-3, रूस की Iskander, भारत की ब्रह्मोस और यूरोप की Storm Shadow/SCALP जैसी मिसाइलें भी अपनी तकनीकी विशेषताओं और संचालन क्षमता के कारण काफी महंगी मानी जाती हैं. हालांकि इनकी कीमतें उनकी भूमिका और संस्करण के अनुसार अलग-अलग होती हैं.
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एक मिसाइल बनाने में कितना होता है खर्च?
मिसाइल बनाने का खर्च उसके प्रकार, तकनीक और क्षमता के अनुसार अलग-अलग होता है. भारत पिछले कुछ सालों में स्वदेशी रक्षा तकनीक पर लगातार जोर दे रहा है, क्योंकि हम आत्मनिर्भर भारत की ओर लगातार आगे बढ़ रहे हैं और भारत के इस कदम से आधुनिक मिसाइलों को बनाने में लगने वाली लागत कम हुई है.
- वहीं, अगर हम 'आकाश मिसाइल' की बात करें तो इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने बनाया है. यह एक सतह से हवा में मार करने वाली एयर डिफेंस मिसाइल है, जिसका इस्तेमाल दुश्मन के लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोन को निशाना बनाने के लिए किया जाता है. एक आकाश मिसाइल की अनुमानित कीमत करीब 2 करोड़ से 2.5 करोड़ रुपये (लगभग 2.5 लाख से 5 लाख अमेरिकी डॉलर) है. इसको बनाने में 1,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे. जो विदेशी मिसाइलों से 8-10 गुना कम है. स्वदेशी तकनीक के कारण इसकी लागत विदेशी एयर डिफेंस मिसाइलों की तुलना में काफी कम मानी जाती है.
- ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस ने मिलकर बनाई है. इसे दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है. एक ब्रह्मोस मिसाइल की अनुमानित कीमत करीब 34 करोड़ रुपये है. वहीं, इसके निर्माण के लिए स्थापित उत्पादन इकाइयों पर लगभग 300 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है. यह मिसाइल ध्वनि की गति से करीब तीन गुना तेज उड़ान भरते हुए अपने लक्ष्य को बेहद कम समय में भेद सकती है.
- अगर 'S-400 एयर डिफेंस सिस्टम' की बात करें, तो यह रूस से खरीदी गई एक अत्याधुनिक रक्षा प्रणाली है. भारत ने इस सिस्टम की खरीद पर करीब 35,000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. इसमें इस्तेमाल होने वाली एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत लगभग 8 करोड़ रुपये तक है. यह प्रणाली दुश्मन के लड़ाकू विमान, ड्रोन और अन्य हवाई खतरों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही हवा में नष्ट करने की क्षमता रखती है.
मिसाइल बनाना इतना महंगा क्यों पड़ता है?
किसी भी मिसाइल की कीमत उसके प्रकार, मारक क्षमता, तकनीकी स्तर, आकार और निर्माण की संख्या पर निर्भर करती है. इसके निर्माण में अत्याधुनिक रडार सिस्टम, सेंसर, माइक्रोप्रोसेसर, नेविगेशन तकनीक, विशेष ईंधन और वॉरहेड जैसे उन्नत उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही, इसकी डिजाइन और निर्माण प्रक्रिया में बेहद उच्च स्तर की सटीकता जरूरी होती है, क्योंकि मामूली सी तकनीकी खामी भी पूरी मिसाइल को निष्प्रभावी बना सकती है. यही वजह है कि मिसाइल बनाने में भारी खर्च होता है.
(With PTI Inputs)