केंद्र सरकार ने लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है. प्रस्तावित 131वें संविधान संशोधन के तहत अनुच्छेद 81 में बदलाव कर सीटों को बढ़ाकर 850 करने की योजना है. प्रस्ताव के अनुसार, 815 सीटें राज्यों और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी. यह बदलाव डिलिमिटेशन (सीमांकन) प्रक्रिया के बाद लागू होगा, जिसमें जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाएगा.
इस पहल को महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) से भी जोड़ा जा रहा है. इस कानून के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी हैं. हालांकि, यह आरक्षण सीमांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लागू होगा.
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यह एक संविधान संशोधन विधेयक है, जिसे संसद में पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी. लोकसभा में इसे पास कराने के लिए करीब 362 सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी.
सरकार का मानना है कि महिला आरक्षण से जुड़े इस प्रस्ताव को विभिन्न राजनीतिक दलों का समर्थन मिल सकता है. कुल मिलाकर, सीटों की संख्या बढ़ाने और सीमांकन की प्रक्रिया को महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
दक्षिण बनाम उत्तर का नया विवाद
इस बीच परिसीमन को लेकर सियासी विवाद एक बार फिर तेज हो गया है. केंद्र सरकार जहां लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण की तैयारी में है, वहीं दक्षिण भारत के राज्यों में इसे लेकर आशंकाएं बढ़ रही हैं.
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डीएमके के एम के स्टालिन का कहना है कि जनसंख्या के आधार पर होने वाला परिसीमन दक्षिण के राज्यों के साथ अन्याय कर सकता है. उनका तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहने वाले राज्यों की सीटें कम हो सकती हैं, जबकि उत्तर भारत के राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं, जिससे संसद में राजनीतिक संतुलन बदल जाएगा.
हालांकि, सरकार की तरफ से गृह मंत्री अमित शाह ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि परिसीमन में दक्षिण के राज्यों को कोई नुकसान नहीं होगा. परिसीमन की प्रक्रिया अनुच्छेद 82 के तहत होती है, जिसमें जनगणना के बाद सीटों और सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है. कुल मिलाकर, एक तरफ संसद में परिसीमन से जुड़ा बिल लाने की तैयारी है, तो दूसरी ओर दक्षिण भारत में इसे लेकर राजनीतिक विरोध भी तेज होता दिख रहा है.
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