Kasargod Lok Sabha Election : चुनाव लड़ने के लिए किसी व्यक्ति को कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। पहले उसे नामांकन फॉर्म भरना पड़ता है जिसमें अपनी संपत्ति से लेकर आपराधिक मामलों तक की हर जानकारी देनी पड़ती है। इसमें जरा सी भी चूक नामांकन खारिज कर सकती है। इसके बाद जनता की कसौटी पर खरा उतरना होता है। यह लगभग हर उस जगह पर नियम की तरह है जहां चुनाव हो रहा है। लेकिन केरल की एक लोकसभा सीट ऐसी है जहां के उम्मीदवारों को भाषा की चुनौती से भी निपटना पड़ता है।
हम बात कर रहे हैं केरल के उत्तरी लोकसभा क्षेत्र कासरगोड की। यहां के उम्मीदवारों को कभी वोट के लिए हिंदी में अपील करते हुए तो थोड़ी ही देर बाद मलयालम और कन्नड़ जैसी भाषाओं में बात करते हुए देखा जा सकता है। दरअसल यह क्षेत्र भाषाई आधार पर बहुत विविध है। यहां बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्हें मलयालम और कन्नड़ में से दोनों भाषाएं नहीं जानते। इसलिए प्रत्याशियों के सामने मतदाताओं से संवाद करने में बड़ी दिक्कत होती है, जिसके लिए उन्हें खूब तैयारी करनी पड़ती है।
कहीं पर कन्नड़ का जोर तो कहीं पर मलयालम
बता दें कि त्रिक्करीपुर, कान्हांगद और होसदुर्ग की मातृभाषा मलयालम है। कासरगोड, कुंबले, मजेश्वर और उप्पला इलाकों में कन्नड़ प्रचलित है। यहां हजारों की संख्या में मराठी परिवार बसे हुए हैं। मुसलमान उर्दू बोलते-समझते हैं और तटीय कर्नाटक व गोवा के लोग कोंकड़ी व तुलु भाषा में बातचीत करते हैं। यहां पर चुनाव में जीत हासिल करने के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि प्रत्याशी मतदाताओं के साथ अच्छे से संवाद कर सके। इसके लिए उम्मीदवारों को कई भाषाएं सीखनी पड़ती हैं।