Loitering Munitions In Indian Navy: भारतीय नौसेना 1000 किलोमीटर तक की ऑपरेशनल रेंज वाले, जहाज से लॉन्च होने वाले 'लोइटरिंग म्यूनिशन' खरीदने पर विचार कर रही है. इन सिस्टम का मकसद युद्धपोतों को 'एसिमेट्रिक खतरों' के खिलाफ मजबूत करना और उन्हें लंबी दूरी तक हमला करने की अतिरिक्त क्षमता देना है. सूत्रों के मुताबिक इसके लिए 50 करोड़ डॉलर की हरी झंडी दे दी गई है.
क्यों लिया गया फैसला?
ये जरूरत तब सामने आई है जब दुनिया भर की सेनाएं संघर्षों में किलर ड्रोन और बिना पायलट वाले सिस्टम के बढ़ते इस्तेमाल के बाद नौसैनिक युद्ध के तरीकों का फिर से आकलन कर रही हैं, जिसमें रेड सी में जहाजों पर होने वाले हमले भी शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय ने मीडियम-रेंज वाले लोइटरिंग म्यूनिशन के लिए जरूरतें तय की हैं. इनसे भारतीय युद्धपोत पारंपरिक मिसाइलों पर पूरी तरह निर्भर रहे बिना काफी दूर मौजूद लक्ष्यों पर हमला कर सकेंगे.
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इन किलर ड्रोंस की खासियत
नेवी ऐसे स्वदेशी सिस्टम चाहती है जो 9 घंटे तक हवा में रह सकें. इन म्यूनिशन में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर का इस्तेमाल होने की उम्मीद है, जिससे वो दिन और रात दोनों समय लक्ष्यों का पता लगा सकें और उन्हें ट्रैक कर सकें. प्रस्तावित हथियारों के बहुत सटीक होने की भी उम्मीद है, जिनकी 'सर्कुलर एरर प्रोबेबल' (CEP) एक मीटर से कम होगी. एक और अहम जरूरत ये है कि वो तब भी काम कर सकें जब सैटेलाइट-नेविगेशन सिग्नल जैमिंग, स्पूफिंग या डिनायल (सिग्नल रोकने) के कारण डिस्टर्ब हों. इस सिस्टम से जहाज पर मौजूद एक ऑपरेटर एक साथ 10 म्यूनिशन को 'मॉड्यूलर कमांड कंसोल' के जरिए कंट्रोल कर सकेगा. कंट्रोल को जहाजों और तट पर स्थित स्टेशनों के बीच भी ट्रांसफर किया जा सकेगा.
समंदर के मुश्किल हालात के लिए डिजाइन
नौसेना ने कड़े एनवायरमेंटल स्टैंडर्ड तय किए हैं. इन सिस्टम को 50 नॉट (knots) तक की हवा की गति और 95% तक की नमी में भी काम करना होगा. अहम पुर्जों की सर्विस लाइफ कम से कम 10 साल होने की उम्मीद है, जिसे 20 साल तक बढ़ाया जा सकेगा.
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स्वदेशी तकनीक पर जोर
इस खरीद के 'Buy Indian-IDDM' या 'Buy Indian' कैटेगरी के तहत होने की उम्मीद है, जिससे घरेलू डिजाइन, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी के मालिकाना हक और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा. ये पहल लंबी दूरी के ऑटोनॉमस हथियारों की दिशा में भारत की बड़ी कोशिशों को दिखाती है, जिन्हें मिलिट्री प्लानर्स भविष्य के युद्ध का एक अहम हिस्सा मानते हैं. उम्मीद है कि ये अभियान 2027 तक पूरा हो जाएगा.
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