अमेरिका ने कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी को रोकने के लिए ईरानी तेल से प्रतिबंध हटा दिया है. अब ये तेल एशिया के देशों में आसानी से जा सकता है. समंदर के बीच ईरानी तेल का बड़ा भंडार है. मिली ताजा जानकारी के अनुसार, भारत की रिफाइनरियां इसे खरीदने की योजना बना रही है. पहले ईरानी तेल सिर्फ चीन द्वारा खरीदा जाता था, लेकिन अब बैन हटने के बाद भारत भी इसमें शामिल हो सकता है.

वहीं, रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, व्यापारियों ने शनिवार को बताया कि अमेरिका-इजरायल वॉर के कारण ईरान पर लगे एनर्जी संकट को कम करने के लिए अमेरिका द्वारा अस्थायी तौर से प्रतिबंध हटाए जाने के बाद भारतीय रिफाइनरियां ईरानी तेल की खरीद फिर से शुरु करने की योजना बना रही हैं, जबकि एशिया के अन्य हिस्सों में रिफाइनरियां भी इस तरह के कदम पर विचार कर रही हैं.

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ईरीन तेल खरीदने के लिए निर्देश का इंतजार

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तीन भारतीय रिफाइनर्स सोर्स ने कहा कि वे ईरानी तेल खरीदेंगे और भुगतान की शर्तों पर सरकार के निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं. रॉयटर्स का कहना है कि भारत में कच्चे तेल का भंडार अन्य बड़े एशियाई देशों की तुलना में काफी कम है. अमेरिका ने हाल ही में रूसी तेल से भी बैन हटा दिया है, जिसके बाद भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की बुकिंग में तेजी दिखाई है.

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अमेरिका ने दी 30 दिनों की छूट

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने शुक्रवार को समुद्र में मौजूद ईरानी तेल की खरीद के लिए 30 दिनों की प्रतिबंध छूट जारी की है. यह छूट समुद्र में स्थित ईरानी तेल पर होगी, जो 19 अप्रैल तक उतारने तक लागू रहेगा. युद्ध शुरू होने के बाद से यह तीसरी बार है जब अमेरिका ने तेल पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी छूट दी है.

समंदर के बीच इतना बड़ा तेल भंडार

केप्लर के कच्चे तेल बाजार डेटा के अनुसार, लगभग 170 मिलियन या 17 करोड़ बैरल ईरानी कच्चा तेल समुद्र में है, जो मिडिल ईस्ट की खाड़ी से लेकर चीन के निकट के जलक्षेत्र तक फैले जहाजों पर मौजूद है. कंसल्टेंसी एनर्जी एस्पेक्ट्स ने 19 मार्च को अनुमान लगाया कि पानी पर 13 करोड़ से 14 करोड़ बैरल ईरानी तेल मौजूद है, जो मिडिल ईस्ट के 14 दिनों के उत्पादन के बराबर है.

एशिया अपनी कच्चे तेल की आपूर्ति का 60% हिस्सा मिडिल ईस्ट से मंगाता है और इस महीने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग बंद होने से पूरे क्षेत्र की रिफाइनरियों को कम दरों पर काम करने और ईंधन निर्यात में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.