रूस-यूक्रेन, अजरबैजान-आर्मेनिया और मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के साथ-साथ भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' ने दुनिया को दिखा दिया है कि अब युद्ध की नीति और रणनीति पूरी तरह बदल चुकी है. भविष्य की जंग पारंपरिक हथियारों से नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के आधुनिक हथियारों और ड्रोन के दम पर लड़ी जाएगी. इस बदलते दौर में खुद को सबसे आगे रखने के लिए भारत तेजी से कदम बढ़ा रहा है. इसी सिलसिले में शुक्रवार को दिल्ली में आयोजित CAPSS-IMR जॉइंट सेमिनार में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमनप्रीत सिंह ने साफ कहा कि ड्रोन, अनमैन्ड एरियल सिस्टम (UAS) और काउंटर-UAS तकनीक ने आधुनिक युद्ध की पूरी तस्वीर को बदल कर रख दिया है. युद्ध अब एक ही जगह से संचालित होने वाली एयर पावर से हटकर, तेजी से ऑटोनॉमस मॉडल की ओर बढ़ रहा है.

ड्रोन भविष्य नहीं, आज की हकीकत हैं

वायुसेना प्रमुख ने जोर देते हुए कहा, "ड्रोन अब भविष्य नहीं, बल्कि आज की हकीकत बन चुके हैं. आज के युद्ध में ड्रोन सिर्फ निगरानी का साधन नहीं रहे, बल्कि वे अब सीधे हमला करने वाले घातक हथियार बन चुके हैं." उन्होंने आगे समझाया कि ड्रोन के सफल होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि इनमें कम खर्च, कम जोखिम और लंबे समय तक काम करने की क्षमता जैसी बेहतरीन खूबियां हैं. इसकी मदद से अब इंसानी जान को कम जोखिम में डालकर युद्ध लड़ा जा सकता है, यही वजह है कि पूरी दुनिया ड्रोन पर भारी निवेश कर रही है.

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'ऑपरेशन सिंदूर' की सफलता का खोला राज

एयर चीफ मार्शल सिंह ने 'ऑपरेशन सिंदूर' का विशेष जिक्र करते हुए बताया कि इसमें भारत का प्रदर्शन बेहद शानदार रहा. इस सफलता के पीछे अलग-अलग एजेंसियों और सेवाओं के बीच का बेहतरीन तालमेल था. उन्होंने खुलासा किया कि IACCS (एकीकृत वायु कमान और नियंत्रण प्रणाली) इस पूरे अभियान का मुख्य केंद्र (नर्व सेंटर) बना हुआ था. वायुसेना प्रमुख ने कहा, "हम इसलिए सफल हुए क्योंकि दुश्मन का कोई भी हथियार या ड्रोन अपने टारगेट तक नहीं पहुंच सका. यह तभी मुमकिन हो पाया जब हमने पूरी तरह एकजुट होकर काम किया. बिना केंद्रीय समन्वय के यह कामयाबी असंभव थी."

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बिल्ली-चूहे का खेल है ड्रोन और डिफेंस सिस्टम

वायुसेना प्रमुख ने ड्रोन रोकने वाली 'काउंटर-UAS' तकनीक की तुलना बिल्ली-चूहे के खेल से की. उन्होंने कहा कि इसमें एक तरफ से हमला होता है, तो दूसरी तरफ उसकी काट के लिए नई तकनीक आ जाती है. इसमें किसी एक पक्ष को कुछ समय के लिए फायदा मिल सकता है, लेकिन वह हमेशा के लिए नहीं होता. इसलिए भारत को लगातार नई तकनीक बनाने और पुरानी तकनीक को अपग्रेड करने की जरूरत है.

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सस्ते ड्रोन और महंगे डिफेंस सिस्टम की चर्चा पर उन्होंने स्पष्ट किया कि बचाए जाने वाले लक्ष्य (टारगेट) की कीमत हमेशा हमलावर ड्रोन से ज्यादा होती है, इसलिए कुछ महत्वपूर्ण जगहों को बचाने के लिए खर्च की चिंता नहीं की जा सकती. अंत में उन्होंने मानव और ड्रोन की साझेदारी (मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग) की वकालत करते हुए कहा कि भविष्य में इंसानों को युद्ध से पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता, दोनों को मिलकर ही काम करना होगा.

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