गलवान में हिंसक टकराव के चलते खराब हुए भारत और चीन के रिश्ते अब धीरे-धीरे सुधरने लगे हैं. मानसरोवर यात्रा और फ्लाइट्स की शुरुआत के बाद अब दोनों देशों के बीच 'सिल्क रूट' नाम से मशहूर नाथू ला पास के रास्ते व्यापार फिर से शुरू हो रहा है. कोरोना महामारी और गलवान संघर्ष के कारण साल 2020 से इस रास्ते से भारत-चीन व्यापार बंद था. हालांकि इस रास्ते से भारत-चीन के बीच छोटा व्यापार होता है, लेकिन यह रास्ता दोनों देशों के लिए कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है.
कैसे पड़ा नाथू ला पास का नाम सिल्क रूट?
भारत और चीन के बीच नाथू ला पास के रास्ते से रेशम के व्यापार होने के कारण इसका नाम 'सिल्क रूट' पड़ा. नाथू ला पास देश के सिक्किम राज्य में है और भारत को तिब्बत से जोड़ता है. नाथू ला पास सिक्किम की राजधानी गंगटोक से 54 किलोमीटर पूर्व दिशा में भारत और चीन बॉर्डर पर स्थित है. नाथू ला पास समुद्र तल से करीब 14140 फीट (4310 मीटर) की ऊंचाई पर है, जो मई से नवंबर महीने तक 7 महीने के लिए खुला रहता है. नाथू ला पास तक जाने और इस रास्ते से तिब्बत-चीन जाने के लिए भारतीय नागरिकों को गंगटोक प्रशासन से विशेष परमिट लेना पड़ता है.
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भारत-चीन के लिए क्यों खास है सिल्क रूट?
नाथू ला पास के रास्ते से भारत और चीन के बीच प्राचीन काल से ही व्यापार होता रहा है. नाथू ला पास तिब्बत की चुम्बी घाटी को सिक्किम और कोलकाता की बंदरगाहों से कनेक्ट करता आया है. 20वीं सदी की शुरुआत में भारत और चीन के बीच नाथू ला पास के रास्ते से 80 प्रतिशत जमीनी व्यापार होता था. लेकिन 1962 की जंग के बाद इस रास्ते को बंद कर दिया गया और इस रास्ते से व्यापार भी कम हो गया. 44 साल तक रास्ता बंद रहा, लेकिन 14000 फीट की ऊंचाई पर भारत और चीन के डाकिया आपस में डाक-चिट्ठियों का थैला बदलकर एक मूक रस्म निभाते रहे.
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44 साल बाद 2006 में खुला था नाथू ला पास
1962 के युद्ध के बाद 44 साल तक बंद रहने के बाद नाथू ला पास 6 जुलाई 2006 को खुला था, लेकिन व्यापार बेहद कम हुआ. उस समय देश के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी बीजिंग की यात्रा पर गए थे. वहां नाथू ला पास खोलने को लेकर सहमति बनी और 6 जुलाई 2006 को नाथू ला पास को भारत-चीन के बीच व्यापार शुरू करने के लिए फिर से खोल दिया गया. लेकिन उस समय भारत-चीन व्यापार के लिए जिन प्रोडक्ट्स की सूची तैयारी हुई, वह पुरानी थी और 44 साल बाद रास्ता खुला था, इसलिए नाथू ला पास फिर से बड़ा आर्थिक कॉरिडोर नहीं बन सका.
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नाथू ला पास से भारत-चीन व्यापार के आंकड़े
नाथू ला पास के रास्ते भारत और चीन के व्यापार संबंधी आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो दोनों देशों की कुल अर्थव्यवस्था के मुकाबले बहुत छोटा-सा व्यापार इस रास्ते से हुए है. साल 2016 में नाथू ला पास से भारत-चीन के बीच रिकॉर्ड 82.68 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ, लेकिन साल 2017 में डोकलाम विवाद के कारण तनाव बढ़ने पर व्यापार सिमटकर 8.86 करोड़ का रह गया. 2019 में कोरोना महामारी से पहले 43.51 करोड़ का व्यापार हुआ. अब फिर से नाथू ला पास सिक्किम के 500 से ज्यादा व्यापारियों और ट्रांसपोर्टरों के लिए रोजी-रोटी का साधन बन जाएगा.
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नाथू ला पास खुलना रिश्तों में सुधार का संकेत
बता दें कि जब-जब दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हुआ, नाथू ला पास बंद हुआ और जब-जब रिश्ते सुधरे नाथू ला पास ओपन हुआ. तनाव बढ़ने पर सबसे पहले ताला इसी रास्ते पर लगता था. अगस्त 2025 में सिक्किम के नाथू ला पास, हिमाचल प्रदेश के शिपकीला पास और उत्तराखंड के लिपुलेख पास के जरिए भारत-चीन व्यापार को बहाल करने पर सहमति बनी थी. आज दोनों देशों के बीच 6 साल के विवाद के बाद सीधी उड़ानें शुरू हो गई हैं. वीजा सर्विस और मानसरोवर यात्रा शुरू हो गई है और अब नाथू ला पास खुलना दोनों पड़ोसी देशों के रिश्ते को ‘नॉर्मल’ करने का संकेत है.
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