19वीं सदी के भारत में रोजमर्रा की जिंदगी में एक ऐसी कांटों की दीवार मौजूद थी जो उस दौर की अधिकांश यूरोपीय सीमाओं से भी ज्यादा लंबी थी. इसका मकसद किसी दुश्मन सेना को रोकना नहीं, बल्कि भारतीय रसोई के बर्तनों तक बिना टैक्स वाला नमक पहुंचने से रोकना था. इस राजस्व की रक्षा के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने भारत भर में करीब 4,000 किलोमीटर लंबी कांटों की एक विशाल दीवार खड़ी कर दी थी. ‘द ग्रेट हेज ऑफ इंडिया’ कोई साधारण दीवार नहीं थी. यह घनी कांटेदार झाड़ियों, पेड़ों, सीमा शुल्क चौकियों और गश्ती मार्गों का एक विशाल और जटिल नेटवर्क था.
अंग्रेजों को क्यों पड़ी इतनी बड़ी दीवार की जरूरत?
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, उस दौर में नमक पर लगने वाला टैक्स अंग्रेजों की कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन चुका था. नमक हर किसी की बुनियादी जरूरत थी और ब्रिटिश हुकूमत इसका पूरा फायदा उठाना चाहती थी. दिक्कत तब शुरू हुई जब अलग-अलग रियासतों और ब्रिटिश नियंत्रण वाले क्षेत्रों में नमक की कीमतें और टैक्स दरें अलग-अलग थीं. व्यापारी कम टैक्स वाले इलाकों से सस्ता नमक खरीदते थे और उसे ज्यादा टैक्स वाले इलाकों में ले जाकर मुनाफे पर बेच देते थे. इससे ईस्ट इंडिया कंपनी के टैक्स कलेक्शन में भारी नुकसान होने लगा.
ब्रिटिश हुकूमत की ओर से भारत में बनाई 4,000 किलोमीटर लंबी कांटों की विशाल बाड़। (@rajbhagatt/X)
शुरुआत में कई चेकपॉइंट और सीमा शुल्क चौकियां
नमक की इस तस्करी को रोकने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने 19वीं सदी की शुरुआत में कई चेकपॉइंट और सीमा शुल्क चौकियां बनाईं. 1843 तक आते-आते यह पूरी व्यवस्था ‘आंतरिक सीमा शुल्क विभाग’ के तहत आ गई. इस विभाग का काम मुख्य रूप से बंगाल प्रेसीडेंसी जैसे उच्च कर वाले क्षेत्रों में बिना टैक्स वाले नमक के प्रवेश को पूरी तरह बंद करना था. जैसे-जैसे देश में अंग्रेजी हुकूमत का दायरा बढ़ा, वैसे-वैसे इस 4,000 किलोमीटर लंबी कांटों की सीमा रेखा का भी विस्तार होता गया. यह दीवार अंग्रेजों की उस क्रूर नीति का प्रतीक थी, जिसने आम आदमी की थाली के नमक पर भी पहरा बैठा दिया था.
चौकियों से लेकर 4,000 किमी लंबी दीवार तक
शुरुआत में सीमा शुल्क चौकियां, चेकपॉइंट और गश्ती रास्ते बनाए गए थे. लोगों की आवाजाही रोकने के लिए खंभे, सूखी लकड़ियां और कांटे लगाए गए. 1860 के दशक तक अंग्रेजों ने बबूल, करोंदा, बेर, कांटेदार नाशपाती और बांस जैसे पौधे लगाकर जीवित दीवार खड़ी कर दी. जहां पौधे नहीं पनपे, वहां सूखी शाखाएं लगाई गईं.
साल 1869 तक यह बाड़ पाकिस्तान के मुल्तान से लेकर ओडिशा तक 4,000 किलोमीटर से अधिक लंबी हो गई. सिंधु, सतलुज और यमुना जैसी नदियां प्राकृतिक सीमा बनीं, जबकि कई जगहों पर खाइयां खोदी गईं. यह बाड़ कई स्थानों पर 10 से 12 फीट ऊंची और 14 फीट तक मोटी थी.
12 हजार कर्मचारियों का कड़ा पहरा
इस विशाल व्यवस्था को संभालने के लिए 1869-70 में करीब 12,000 कर्मचारी तैनात थे और 1,727 सीमा शुल्क चौकियां बनाई गई थीं. रास्ते भर गार्ड, इंस्पेक्टर, माली और मजदूर पहरा देते थे. तूफान, आग, दीमक और चूहों से होने वाले नुकसान की लगातार मरम्मत होती थी. एक किलोमीटर में 250 टन तक सूखी झाड़ियां लगाई जाती थीं. इस व्यवस्था को मजबूत करने वाले आंतरिक सीमा शुल्क आयुक्त एलन ऑक्टेवियन ह्यूम थे, जिन्होंने बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की.
नमक से अंग्रेजों की बंपर कमाई
साल 1869-70 में इस लाइन से अंग्रेजों को नमक टैक्स के रूप में करीब 1.25 करोड़ रुपये मिले, जबकि इसके रखरखाव का खर्च सिर्फ 16.2 लाख रुपये आया. 1877 तक नमक कर से ब्रिटिश सरकार का राजस्व लगभग 63 लाख पाउंड तक पहुंच गया, जिससे नमक उनके सबसे बड़े मुनाफे का जरिया बन गया.
तस्कर निकालते रहे नए रास्ते
कड़े पहरे के बावजूद नमक तस्कर बाड़ पार करने की तरकीबें निकालते रहे. तस्कर दीवार के ऊपर से नमक की बोरियां फेंककर दूसरी तरफ खड़े साथियों तक पहुंचा देते थे. कई बार वे बाड़ को काट देते, आग लगा देते या कमजोर जगहों से रास्ता बना लेते थे.
कैसे गायब हो गई 4,000 किमी लंबी दीवार?
19वीं सदी के अंत में अंग्रेजों ने पूरे भारत में नमक पर एक जैसा टैक्स लागू कर दिया. कीमतों का अंतर खत्म होते ही इस भारी-भरकम बाड़ की जरूरत भी खत्म हो गई. आखिरकार 1879 में ‘आंतरिक सीमा शुल्क रेखा’ को औपचारिक रूप से खत्म कर दिया गया और विभाग को भंग कर दिया गया. रखरखाव बंद होते ही कांटेदार पौधे नष्ट होने लगे. लोगों ने उपयोगी लकड़ियां निकाल लीं और मिट्टी के तटबंध ढह गए. देखते ही देखते कुछ ही दशकों में यह विशाल दीवार कुदरत और समय के थपेड़ों में पूरी तरह गायब हो गई.
पूर्व डाकू की मदद से मिले अवशेष
सालों तक इतिहास के पन्नों में दबी इस दीवार को खोजने 1995 में ब्रिटिश इतिहासकार रॉय मॉक्सहैम भारत आए. उत्तर प्रदेश के ऐराक में उनकी मुलाकात एक बुजुर्ग पुजारी से हुई, जो जवानी में डाकू रह चुके थे. पुजारी की मदद से मॉक्सहैम ने यूपी के इटावा के पास इस दीवार के बचे हुए अवशेष ढूंढ निकाले. इस खोज पर उन्होंने 2001 में ‘द ग्रेट हेज ऑफ इंडिया’ नाम से एक मशहूर किताब भी लिखी.
नमक बना आजादी का हथियार
दीवार भले ही खत्म हो गई, लेकिन नमक पर अंग्रेजों का क्रूर टैक्स जारी रहा. करीब 50 साल बाद 1930 में महात्मा गांधी ने इसी नमक कर के खिलाफ ‘दांडी मार्च’ निकाला और इसे सविनय अवज्ञा आंदोलन का सबसे बड़ा हथियार बना दिया. देश आजाद होने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में इस टैक्स को पूरी तरह खत्म किया गया.
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