चुनावों की घोषणा होते ही देश में आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है और इसके साथ ही सारी प्रशासनिक शक्तियां चुनाव आयोग के हाथों में आ जाती हैं. हाल ही में पश्चिम बंगाल में मुख्य सचिव और डीजीपी समेत कई शीर्ष अधिकारियों के तबादले ने इस पर नई बहस छेड़ दी है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे 'एकतरफा और मनमाना' बताया है. लेकिन हकीकत यह है कि निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आयोग के पास असीमित अधिकार होते हैं. चुनाव आयोग के लिए अफसरों को बदलने की कोई तय सीमा नहीं है. वह जरूरत पड़ने पर किसी भी राज्य में सैकड़ों या हजारों अधिकारियों का तबादला कर सकता है. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में तो एक साथ कई अफसरों तक को बदलने के उदाहरण मौजूद हैं.

चुनाव आयोग को इतनी ताकत मिलती कहां से है?

इसका जवाब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में छिपा है. यह अनुच्छेद आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की पूरी जिम्मेदारी देता है. हालांकि संविधान में सीधे तौर पर अफसरों को बदलने का नियम नहीं लिखा है. लेकिन 1978 के 'मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि अगर कानून में कहीं कोई खाली जगह है, तो निष्पक्ष चुनाव के लिए आयोग नए प्रशासनिक उपाय कर सकता है. इसी फैसले ने आयोग की शक्तियों को व्यापक आधार दिया, जिससे वह न केवल तबादले कर सकता है, बल्कि जरूरत पड़ने पर अधिकारियों को निलंबित करने का आदेश भी दे सकता है.

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तबादलों से पहले राज्य सरकार की सहमति जरूरी है?

नियम कहते हैं कि आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद चुनाव आयोग को राज्य सरकार से औपचारिक परामर्श करने की कोई बाध्यता नहीं है. आयोग आमतौर पर उन अधिकारियों को तुरंत हटाने का आदेश देता है जो अपने गृह जिले में तैनात हों या जिन्हें एक ही जिले में तीन साल से ज्यादा समय हो गया हो. इसके अलावा, जिला मजिस्ट्रेट (DM), पुलिस अधीक्षक (SP), कमिश्नर और एसएचओ जैसे सीधे चुनाव से जुड़े पदों पर बैठे अफसरों का तबादला एक रूटीन प्रक्रिया है. इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय राजनीतिक दबाव को कम करना और अफसर-राजनेता के पुराने गठजोड़ को खत्म करना होता है.

संवेदनशील राज्यों में आयोग की पैनी नजर और सख्त कार्रवाई

उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों को चुनाव के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है. यहां अक्सर राजनीतिक टकराव और हिंसा की खबरें आती हैं. इसलिए इन राज्यों में आयोग सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है. बंगाल जैसे राज्यों में अधिकारियों के रोटेशन को लेकर अक्सर विवाद होता है. लेकिन आयोग का तर्क रहता है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह जरूरी है, जब तक चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती. राज्य की पूरी मशीनरी एक तरह से चुनाव आयोग की प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर होती है. राज्य सरकार इस दौरान अपनी मर्जी से किसी भी अधिकारी का ट्रांसफर नहीं कर सकती. यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव बिना किसी डर या पक्षपात के संपन्न हो सके.