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पिता को पकड़ने के लिए पुलिस ने बच्चे का किया 'चारे' की तरह इस्तेमाल, कोर्ट ने लगाई कड़ी फटकार

गुजरात पुलिस को दिल्ली की एक अदालत ने कड़ी फटकार लगाई है, क्योंकि पुलिस ने एक नाबालिग बच्चे को इसलिए अहमदाबाद ले जाया गया ताकि उसके पिता को सरेंडर कराने पर मजबूर किया जा सके. कोर्ट का कहना है कि इस वांटेड शख्स के बेटे को ‘चारे’ की तरह इस्तेमाल किया गया.

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दिल्ली की अदालत ने गुजरात पुलिस को लगाई फटकार (AI Image)

Delhi Court Slams Gujarat Police: दिल्ली की एक अदालत ने गुजरात पुलिस के 4 अधिकारियों की कड़ी आलोचना की है. इन पर आरोप है कि वो एक नाबालिग लड़के को उसके पिता की तलाश में दिल्ली से अहमदाबाद ले गए थे. कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि बच्चे का इस्तेमाल उस वांछित शख्स को सरेंडर करने के लिए मजबूर करने के लिए एक ‘चारे’ के तौर पर किया गया था. एडिशनल सेशन जज प्रवीण सिंह ने अधिकारियों की उस रिवीजन पिटीशन को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें कथित अपराध का संज्ञान लिया गया था और आरोप तय करने का निर्देश दिया गया था.

कोर्ट ने पुलिस के बर्ताव पर उठाए सवाल

12 अगस्त 2026 के अपने आदेश में अदालत ने कहा कि अधिकारियों को लड़के के पिता का पता लगाने का काम सौंपा गया था, जो एक आपराधिक मामले में वांछित था. इसके बजाय, उन्होंने कथित तौर पर बच्चे को अपनी कस्टडी में ले लिया और उसे राज्य की सीमाओं के पार ले गए. जज ने इस बर्ताव की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि अधिकारियों ने बच्चे को उसके पिता के सरेंडर के लिए ‘चारे’ के तौर पर इस्तेमाल किया.

ये मामला लड़के की मां की शिकायत से शुरू हुआ था. अभियोजन पक्ष के अनुसार, 25 मई 2008 को गुजरात पुलिस के कई कर्मचारी सादे कपड़ों में दिल्ली में उसकी कबाड़ की दुकान पर पहुंचे और उसके पति की तलाश करने लगे. अधिकारियों ने कथित तौर पर उसकी मर्जी के खिलाफ उसके नाबालिग बेटे को अपने साथ ले लिया और उसे गुजरात ले आए.

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आरोप है कि जर्नी के दौरान बच्चे को कैद में रखा गया और उसके साथ फिजिकल एब्यूज किया गया. पीड़ित पक्ष ने मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान का भी हवाला दिया, जिसमें कथित तौर पर कहा गया था कि लड़के को पुलिस लॉक-अप में रखा गया और प्रताड़ित किया गया.

पुलिस की दलील खारिज

पुलिस अधिकारियों ने तर्क दिया कि वो फरार आरोपी का पता लगाने की कोशिश करते हुए अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों का पालन कर रहे थे. उन्होंने दावा किया कि इसलिए मुकदमा चलाने से पहले सरकारी मंजूरी जरूरी थी. अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का मतलब यह नहीं है कि ऑफिशियल ड्यूटी करते हुए की गई हर कार्रवाई खुद ब खुद ही इसके दायरे में आ जाएगी. उस खास काम का उन ड्यूटीज से उचित संबंध होना चाहिए.

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‘बच्चे को मां से दूर ले जाना गलत’

जज ने माना कि बच्चे को उसकी मां से दूर ले जाना और उसके पिता का पता लगाने के लिए उसे अहमदाबाद ले जाना, उचित रूप से ऑफिशियल पुलिस फंक्शन नहीं माना जा सकता. अदालत ने अधिकारियों के उस दावे को भी खारिज कर दिया कि मामले का संज्ञान 2026 में लिया गया था; कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि ऐसा 2010 में ही हो गया था. इस मामले में रिवीजन पिटीशन खारिज कर दी गई, जिससे ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रहा.

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लेखक के बारे में

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.
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